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सपा छोड़ स्वामी प्रसाद मौर्य बना सकते हैं अपनी नई पार्टी! अखिलेश यादव से नाराजगी का कारण जानिए

न्यूज अड्डा डेस्क

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Feb 19, 2024  |  11:35 AM

58 लोगों ने इस खबर को पढ़ा.
सपा छोड़ स्वामी प्रसाद मौर्य बना सकते हैं अपनी नई पार्टी! अखिलेश यादव से नाराजगी का कारण जानिए

Swami Prasad Maurya: उत्तर प्रदेश की सियासत में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बड़ी फेरबदल होती नजर आ रही है। अखिलेश यादव को एक और झटका लग सकता है। सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी छोड़कर 22 फरवरी को स्वामी प्रसाद मौर्य अपनी नई पार्टी का ऐलान कर सकते हैं। इस सूचना ने यूपी की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। हालांकि, अभी तक स्वामी प्रसाद मौर्य की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है। बता दें, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से वो पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं।

इस्तीफे के बाद गरमाई राजनीति

स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद समाजवादी पार्टी के भीतर हलचल तेज हो गई है। कई नेताओं ने स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ अपने रिश्ते को सार्वजनिक करना शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से कई नेताओं ने स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफा न स्वीकार करने की अपील की है। दरअसल, यूपी चुनाव 2022 के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य समाजवादी पार्टी से जुड़े थे। इसके बाद उनके करीबी नेताओं ने भी सपा ज्वाइन कर ली। अब स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य अपने रुख में बदलाव करते नहीं दिख रहे हैं।

‘पच्चीस तो हमारा है, 15 में भी बंटवारे’ का नारा

अखिलेश यादव को लिखे पत्र में मौर्य ने कहा था कि जब से मैं समाजवादी पार्टी में शामिल हुआ हूं, लगातार जनाधार बढ़ाने की कोशिश की है। जिस दिन मैं सपा में शामिल हुआ था उस दिन मैंने ‘पच्चीस तो हमारा है, 15 में भी बंटवारे’ का नारा दिया था। हमारे महापुरुषों ने भी इसी तरह की लाइन खींची थी। इसके साथ ही उन्होंने चिट्ठी में कई और बड़े नेताओं के नारे का जिक्र किया था। उन्होंने लिखा कि पार्टी की ओर से हमारे नारे को निष्प्रभावी बनाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, पार्टी के नेता मेरे को निजी बताकर खारिज कर रहे हैं।

सूत्रों के हवाले से आ रही खबर को सच माना जाए तो स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद उनकी नई पार्टी से कई सीनियर नेता जुड़ सकते हैं। अखिलेश यादव को बड़ा झटका लग सकता है। स्वामी मौर्य एक बड़ी राजनीति करते दिख रहे हैं। दरअसल, बहुजन समाज पार्टी से कमजोर होने के बाद दलित वोट बैंक पर कब्जा जमाने की होड़ तेज हो गई है। भाजपा मुफ्त राशन योजना के साथ इस वर्ग के वोट बैंक को साधती दिख रही है। वहीं, स्वामी प्रसाद मौर्य के रुख से अखिलेश यादव के पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक यानी पीडीएफ फ्रंट में बड़ी डेंट लग सकती है।

ऐसे बदली स्वामी प्रसाद मौर्य की राजनीति

स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपनी राजनीति बहुजन समाज पार्टी के नेता के तौर पर शुरू की थी। 2 जनवरी 1954 को प्रतापगढ़ में जन्मे स्वामी प्रसाद मौर्य ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की। 1996 से स्वामी प्रसाद मौर्य चुनावी राजनीति में आए। उन्हें एक समय बसपा सुप्रीमो मायावती का सबसे अधिक करीबी उन्हें माना जाता था। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में अब तक चार बार पाला बदला है। लोक दल से राजनीति की शुरुआत करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य जनता दल, बसपा, भाजपा और सपा तक का सफर तय किया है। अगर वे नई पार्टी का ऐलान करते हैं तो यह उनकी पांचवां मौका होगा।

स्वामी प्रसााद मौर्य का राजनीतिक जीवन:

  • 1980 के दशक से राजनीति शुरू की। वह प्रयागराज तत्कालीन इलाहाबाद में युवा लोकदल के संयोजक के रूप में राजनीतिक करियर की शुरुआत की।
  • 1981 में वह युवा लोक दल में उत्तर प्रदेश की कार्यसमिति के सदस्य बनाए गए।
  • 1982 से 1985 तक युवा लोक दल के प्रदेश महामंत्री के रूप में कार्य किया। इस दौरान वे लोक दल की प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भी रहे।
  • 1986 से 1989 तक वह लोक दल के प्रदेश महामंत्री रहे।
  • 1989 से 1991 तक लोक दल के मुख्य महासचिव रहे।
  • 1991 से 1995 तक स्वामी प्रसाद मौर्य जनता दल के प्रदेश महासचिव रहे।
  • 1996 में पाला बदलकर बसपा में आए। बसपा के टिकट पर पहली बार डलमऊ विधानसभा सीट से विधायक बने।
  • 2002 में बसपा के टिकट पर दूसरी बार डलमऊ विधानसभा सीट से विधायक बने।
  • 2009 में पडरौना विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव में जीत दर्ज कर तीसरी बार विधानसभा पहुंचे।
  • 2012 में पडरौना विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर चौथी बार वे विधायक बने।
  • 2017 विधानसभा चुनाव के पहले बसपा से 20 सालों का साथ छोड़ा। भाजपा के टिकट पर पडरौना से उतरे और जीत हासिल की।
  • 2022 में भाजपा छोड़कर सपा का दामन था। समाजवादी पार्टी ने फाजिलनगर विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। भाजपा के सुरेंद्र कुशवाहा के हाथों हार झेलनी पड़ी।
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