हाटा/कुशीनगर। भारतीय ज्ञान परम्परा सदियों से समृद्ध रही है।जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए जिन सिद्धांतों की रूपरेखा हमारे आचार्यों ने बनायी उसमें मानवता को प्रोत्साहित करना प्रमुख उद्देश्य है।
उक्त बातें डा सुधाकर तिवारी ने स्थानीय श्रीनाथ संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय ज्ञान परम्परा, चिंतन कार्यशाला के दूसरे दिन के व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता कही।। उन्होंने कहा कि धर्म की जिस अवधारणा में हमने ईश्वर को समा लिया है वह स्वरूप पहले नहीं था। प्रकृति की पूजा थी। भारतीय ज्ञान परम्परा जीव और ईश्वर को एकाकार करने की परंपरा थी।वह परा और अपरा विद्या से शुरू होकर जीवोन्मुख से ईश्वरत्व का विधान करते थे। पौराणिक काल में ज्ञान को अप्रतिम माना गया है। तक्षशिला, नालंदा, उज्जयिनी,बल्लभी, विक्रमशिला ज्ञान शिक्षा और शोध के प्रमुख केन्द्र थे।इस दौरान संयोजक श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के सांख्य योग विभागाध्यक्ष प्रो मार्कण्डेय नाथ तिवारी ने अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा सदियों से ज्ञान के माध्यम से मानव जीवन की उन्नति के लिए महत्वपूर्ण रही है जिसके अनेक सिद्धांतों से समाज और देश की उन्नति हो रही है। विविध धाराओं में उत्तम सफलता से देश मजबूत हो रहा है।भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है।
इस दौरान प्राचार्य डॉ राजेश कुमार चतुर्वेदी, डा बशिष्ठ द्विवेदी,सतीश चन्द्र शुक्ल,डा राम ऋषि द्विवेदी,डा रामानुज द्विवेदी, संजय पाण्डेय,डा संदीप कुमार पाण्डेय सहित अन्य प्रतिभागी सम्मिलित रहे।
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