इंगलैंड के लीवर ब्रदर्स ने किसी जमाने में बेहद चर्चित वनस्पति घी ब्रांड के नाम में अगर अंग्रेजी का अक्षर ‘एल’ नहीं जोड़ा होता तो भारत में वनस्पति घी के पर्याय बन गए उस ब्रांड को हम आज ‘डाडा’ बोल रहे होते, ‘डालडा’ नहीं। डाडा दरअसल एक हॉलैंड की कंपनी का नाम था, जो वर्ष 1930 के दशक में भारत में वनस्पति घी का निर्यात करती थी। यह घी गाय के दूध से बने देसी घी की तुलना में सस्ता था। उस समय शुद्ध घी काफी महंगा होता था और लगभग सभी भारतीय घरों में सप्ताहंत में किसी खास मौके पर विशेष व्यंजनों या मिठाई में इसका प्रयोग होता था। दूसरी तरफ देसी घी इस्तेमाल नहीं कर सकने वाले उपभोक्ताओं के लिए वनस्पति घी सस्ता विकल्प था।
लीवर ब्रदर्स (अब यूनिलीवर और भारत में हिंदुस्तान लीवर के नाम से मशहूर) जानते थे कि देसी घी के बदले में कोई और चीज बाजार में अपना दबदबा बना सकती है क्योंकि उस समय अधिकतर भारतीयों में घी खरीदने की कुव्वत नहीं थी। यूरोप में 20वीं सदी की शुरुआत में होम और पर्सनल केयर उत्पाद बनाने वाली लीवर ब्रदर्स खाद्यï उत्पादन क्षेत्र में प्रवेश कर ही चुकी थी और और वे भारत में वनस्पति घी के उत्पादन की योजना भी बना रही थी। इसी मकसद से 1931 में उसने हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग कंपनी भी स्थापित की। घरेलू वनस्पति घी के बाजार में संभावनाओं को भांपते हुए लीवर ब्रदर्स ने भारत में डाडा बनाने का अधिकार हासिल कर किया। लेकिन बिक्री से पहले ही यह शर्त रख दी गई थी कि इसका नाम ‘डाडा’ था। लेकिन लीवर की सोच कुछ और थी। लीवर ब्रदर्स का भी मानना था कि उत्पाद पर कहीं भी मालिक कंपनी का ठप्पा होना तो जरूरी है। आखिरकार बाजार की पैनी समझ रखने वाली इस कंपनी ने इसका हल भी निकाल ही लिया। लीवर शब्द का पहला अक्षर ‘एल’ डाडा नाम के बीच में लगाया गया और 1937 में ‘डालडा’ का अस्तित्व दुनिया के सामने आया।
लेकिन इतना करने से ही लीवर का काम खत्म नहीं हुआ। भारतीय इस बात से आश्वस्त नहीं थे कि कोई उत्पाद घी का विकल्प भी हो सकता है। घी खाना पकाने के दौरान या खाने में ऊपर से डालने के बाद अपने स्वाद और सुगंध के लिए ही जाना जाता था। बंगे इंडिया के विपणन प्रमुख और डालडा के वर्तमान मालिक सागर बोक ने कहा, ‘शुरुआत के वर्षों में डालडा के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इसका स्वाद देसी घी की तरह हो और इसमें तलने की क्षमता भी हो। हालांकि डालडा की अपनी खूबियां थी। लेकिन यह देसी घी की तरह जेब और थाली में ज्यादा भारी मालूम नहीं होता था।’ इसी दौरान लीवर की विज्ञापन एजेंसी लिंटास सामने आई। लिंटास मेंं डालडा के विज्ञापनों को देखने वाले हार्वी डंकन ने 1939 में भारत का पहला मल्टी मीडिया विज्ञापन अभियान तैयार किया।
उस दौर के विज्ञापन की दुनिया में यह एक बड़ा विज्ञापन अभियान था जब थियेटरों में डालडा से जुड़ी छोटी फिल्म दिखाई जाने लगी। पढ़े-लिखे लोगों के लिए अखबारों में विज्ञापन दिए जाने लगे और गलियों में कनस्तर की गोल आकृति वाली वैन नजर आने लगीं। कई स्टॉल लगाए गए जिसके जरिये इसके सैंपल ग्राहकों को दिए जाने लगे और पर्चे भी बांटे जाने लगे।
डालडा ने न केवल अपने विज्ञापन अभियान के जरिये बेहतरीन प्रदर्शन किया बल्कि डालडा का पीले रंग का टिन का डिब्बा भी लोगों को खूब भाया, जिस पर खजूर के पेड़ का हरे रंग का लोगो था। इसने भी ब्रांड के लिए कमाल कर दिया। लीवर ने अपने वितरण नेटवर्क के जरिए इन टिन के डिब्बों को देश के हर हिस्से में भिजवाया। विभिन्न उपभोक्ताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न आकार के पैक तैयार किए गए। बड़े संस्थानों जैसे होटल और रेस्तरां के लिए टिन के बड़े चौकोर डिब्बों का इस्तेमाल किया जाता था जबकि घरों के लिए टिन के छोटे गोल डिब्बे आते थे। लीवर ने उस वक्त डालडा के प्रचार को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उसने डालडा को शुद्घ घी का बेहद विश्वसनीय विकल्प बना दिया।
विज्ञापन के इतिहासकारों के मुताबिक पहले 25 से 30 सालों तक डालडा के साथ दूसरे किसी स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल निर्माता कोई मुकाबला नहीं कर सके। डालडा ने 1980 के दशक तक बाजार पर अपना एकाधिकार जमा रखा था। हालांकि शुरुआत में डालडा कई विवादों में भी घिरा। 1950 के दशक में कुछ समय के लिए डालडा पर रोक लगाने की मांग भी की गई क्योंकि आलोचकों के अनुसार डालडा ने झूठा प्रचार करते हुए इसे देसी घी का विकल्प बताया था लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था। आलोचकों के मुताबिक डालडा देसी घी का मिलावटी रूप था जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता था।
शुद्ध देशी घी के पक्षधर लोगों ने डालडा का ऐसा जबरदस्त विरोध किया कि उन दिनों सामूहिक भोज में शामिल होने के पहले लोग पूछने लगे कि रसोई विलायती घी (डालडा वनस्पति) से बनाई है या गाय के दूध से बने देशी घी से। यह बहस 50 के दशक में लोकसभा तक पहुंच गई। तत्कालीन सांसद ठाकुरदास भार्गव ने एक बिल पेश करते हुए मांग की कि सरकार देश में वनस्पति घी के उत्पादन और बिक्री पर कानूनी प्रतिबंध लगाए। संसद में बहस छिड़ी और कहा गया कि वनस्पति घी के 47 कारखाने (तब) हैं, जहां अधिकतम 30 हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है। यही नहीं, दुधारु पशुओं का लालन-पालन करके रोजगार पाने वाले लाखों ग्रामीण बेरोजगार हो जाएंगे। वहीं दूसरी अोर कहा गया कि यदि खाद्य पदार्थ के रूप में भारत में वनस्पति घी का चलन बढ़ा तो
लाइफ स्टाइल से जुड़े रोग बढ़ेंगे।
लोकसभा में ठाकुरदास भार्गव के लंबे संबोधन का मजाक उड़ाते हुए कम्युनिस्ट सांसद वी.पी. नायर ने उस वक्त कहा था- ठाकुरदास भार्गव शुद्ध देशी घी खाते हैं, वे घंटों बोल सकते हैं। जो वनस्पति घी खाते हैं, वे सांसद 15 मिनट में चुप हो गए हैं। लंबी दिलचस्प बहस के बावजूद वनस्पति घी पर प्रतिबंध का प्रस्ताव लोकसभा ने नकार दिया। इसके बाद डालडा इतना लोकप्रिय हुआ कि वनस्पति घी का पर्याय बन गया।
इसके बाद 1990 के दशक में डालडा एक और विवाद में फंस गया, जब उस पर आरोप लगाया गया कि वनस्पति घी में जानवरों की चर्बी मिलाई जाती है। उस समय तक डालडा का मुकाबला रिफाइन्ड वनस्पति तेलों से शुरू हो चुका था, मसलन मूंगफली का तेल (पोस्टमैन), सरसों का तेल, सैफ्लावर (सफोला), सूरजमुखी का तेल (सनड्रॉप) और खजूर का तेल (पामोलीन)। वनस्पति घी की तुलना में इन तेलों को अधिक सेहतमंद समझा जाने लगा। डालडा देश के रसोई घरों में अपनी पकड़ खो रहा था और वर्ष 2003 तक एचयूएल ने लगभग 100 करोड़ रुपये में इसे अमेरिका की कृषि और खाद्य से जुड़ी कंपनी बंगे को बेच दिया था।
बंगे के लिए खाद्य तेल के बाजार में डालडा का अधिग्रहण करना एक बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन डालडा वनस्पति घी की यादों ने इस शुरुआत में दिक्कतें पैदा कीं। बोक ने कहा, ‘हमने 2007 में डालडा खाद्य तेल को ‘हस्बैंड चॉइस’ टैगलाइन के तहत पेश किया। लेकिन जल्द ही हम समझ गए कि यह बाजार में पैठ नहीं बना पाएगा। इसलिए हम इसे 2013 में ‘डब्बा खाली पेट फुल’ टैगलाइन के साथ लाए।’
Dalda failure story | Dalda Ghee, नए जमाने के साथ कैसे बदलता गया हेरिटेज ब्रांड डालडा
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