जौरा बाजार/कुशीनगर। फाजिलनगर क्षेत्र के कोटवा करजही चल रहे भागवत कथा के दूसरे दिन बृहस्पतिवार को काशी से आये कथा बाचक आचार्य पण्डित सत्येन्द्र पाठक ने सृष्टि की उत्पत्ति की कथा सुनाया उन्होंने वर्णन करते हुए कहा कि ब्रह्मा जी ने आदि देव भगवान की खोज करने के लिए कमल की नाल के छिद्र में प्रवेश कर जल में अंत तक ढूंढा। परंतु भगवान उन्हें कहीं भी नहीं मिले। ब्रह्मा जी ने अपने अधिष्ठान भगवान को खोजने में सौ वर्ष व्यतीत कर दिये। अंत में ब्रह्मा जी ने समाधि ले ली। इस समाधि द्वारा उन्होंने अपने अधिष्ठान को अपने अंतःकरण में प्रकाशित होते देखा। शेष जी की शैय्या पर पुरुषोत्तम भगवान अकेले लेटे हुए दिखाई दिये। ब्रह्मा जी ने पुरुषोत्तम भगवान से सृष्टि रचना का आदेश प्राप्त किया और कमल के छिद्र से बाहर निकल कर कमल कोष पर विराजमान हो गये। इसके बाद संसार की रचना पर विचार करने लगे।
ब्रह्मा जी ने उस कमल कोष के तीन विभाग भूः भुवः स्वः किये। ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने का दृढ़ संकल्प लिया और उनके मन से मरीचि, नेत्रों से अत्रि, मुख से अंगिरा, कान से, पुलस्त्य, नाभि से पुलह, हाथ से कृतु, त्वचा से भृगु, प्राण से वशिष्ठ, अंगूठे से दक्ष तथा गोद से नारद उत्पन्न हुये। इसी प्रकार उनके दायें स्तन से धर्म, पीठ से अधर्म, हृदय से काम, दोनों भौंहों से क्रोध, मुख से सरस्वती, नीचे के ओंठ से लोभ, लिंग से समुद्र तथा छाया से कर्दम ऋषि प्रकट हुये। इस प्रकार यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्मा जी के मन और शरीर से उत्पन्न हुये। एक बार ब्रह्मा जी ने एक घटना से लज्जित होकर अपना शरीर त्याग दिया। उनके उस त्यागे हुये शरीर को दिशाओं ने कुहरा और अन्धकार के रूप में ग्रहण कर लिया।
इस दौरान डॉक्टर मस्तराज सिंह,मारकण्डेय सिंह,राजबहादुर सिंह,मुंशी सिंह,नंदकिशोर कुशवाहा,राजेश जायसवाल, छोटे राय, अमरजीत कुशवाहा, जय प्रकाश राय रामधनी गुप्ता ,रामानंद वर्मा, कृष्णा दत्त वर्मा, जयप्रकाश शर्मा,रीना देवी, कालिन्दी देवी,प्रभावती देवी चंपा देवी,पिंकी सिंह आदि श्रद्धालु मौजूद रहे।
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