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कसया: अज्ञेय के जन्मदिवस पर बुद्ध स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय द्वारा विशेष संगोष्ठी का हुआ आयोजन

न्यूज अड्डा डेस्क

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Mar 7, 2022  |  7:35 PM

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कसया: अज्ञेय के जन्मदिवस पर बुद्ध स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय द्वारा विशेष संगोष्ठी का हुआ आयोजन
  • सौंदर्य और शिवत्व की प्राप्ति विवेक से होती हैं -प्रो. विश्वनाथ
  • अज्ञेय ने स्त्री के व्यक्तित्व को स्वतंत्रता प्रदान किया -विशिष्ट अतिथि प्रो.रामदेव शुक्ल

कसया/कुशीनगर। सौंदर्य वह है जो मन में विकार नहीं पैदा करता। अज्ञेय का मानना है कि सौंदर्य और शिवत्व की प्राप्ति विवेक से होती है। अज्ञेय प्रकृति से बहुत ज्यादा जुड़े हुए हैं इसलिए उनके साहित्य में प्रकृति पर्याप्त मात्रा में है। उक्त बातें अज्ञेय के जन्मदिवस पर विद्या श्री न्यास, भारतीय साहित्य संस्थान न्यास और बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर द्वारा आयोजित संगोष्ठी में साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कही। उन्होंने कहा कि भारत में सौंदर्य की चर्चा तो प्राचीन काल से होती आ रही है सौंदर्य शास्त्र की चर्चा बहुत बाद में शुरू हुई। उन्होंने आइंस्टीन और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच सत्य और सौंदर्य पर हुई चर्चा पर भी प्रकाश डाला।

संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि प्रो. रामदेव शुक्ल ने अज्ञेय के कथा साहित्य पर चर्चा करते हुए कहा कि स्त्री के लिए जितनी कोमल भावनाएँ अज्ञेय में हैं उतनी उनके समकालीन किसी भी साहित्यकार में नहीं हैं। अज्ञेय ने स्त्री पुरुष सम्बन्धों को लेकर भारत में प्रचलित मान्यताओं को तोड़ा है और स्त्री के व्यक्तित्व को स्वतंत्रता प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि अज्ञेय की सौंदर्य दृष्टि अपने पिता से संघर्ष करते हुए, माँ से घोर प्रेम और वितृष्णा से, अपनी बहनों से मिले अगाध स्नेह और आत्मिक प्रताणनाओं से बनी।

अज्ञेय की कविताओं पर अपना वक्तव्य रखते हुए प्रोफेसर अनंत मिश्र ने कहा कि अज्ञेय ने प्रेम और सौंदर्य पर खूब लिखा है। पूरी प्रकृति एक लय में है। अज्ञेय ने सृष्टि की लय को पकड़ा है। सृष्टि की यह लय उनकी कविताओं में साफ परिलक्षित होती है। उन्होंने सौंदर्य के तात्विक रूप को धरातल प्रदान किया है।

अज्ञेय के कथेतर गद्य पर बोलते हुए प्रोफेसर चित्तरंजन मिश्र ने कहा कि सौंदर्य दृष्टि और दृष्टि के सौंदर्य में अंतर है। अज्ञेय ने बताया है कि जो सुन्दर हो वह शिव भी हो यह जरूरी नहीं। अज्ञेय सौंदर्य के साथ विवेक, लोक, आध्यात्म प्रकृति आदि के प्रश्न भी उठाते हैं। अज्ञेय की सौंदर्य दृष्टि जड़ता को पहचानने का विवेक देती है।

बीज वक्तव्य देते हुए डॉ अरुणेश नीरन ने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में लोक, संस्कृति, काल, इतिहास, सौंदर्य सब देखे जा सकते हैं। उनकी असाध्य वीणा कविता उनके सौंदर्य दृष्टि का सबसे सुंदर प्रमाण है। उन्होंने अज्ञेय की सम्वेदनशीलता और कुशीनगर से उनके आत्मिक लगाव की भी चर्चा की।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष और प्रोफेसर महेश्वर मिश्र ने कहा कि अज्ञेय की सौंदर्य दृष्टि को वही समझ सकता है जिसके पास उनके मौन को मापने की क्षमता है। अज्ञेय समग्र लेखकीय विवेक की बात करते थे। उन्होंने कहा कि अज्ञेय की रचनाओं के अधिकतर शीर्षक प्रकृति परक हैं यह अनायास नहीं है।

कार्यक्रम में पूर्व प्राचार्य डॉ अमृतांशु शुक्ल ने अतिथियों का स्वागत किया। श्री गिरिधर करुण, श्री सरोज पाण्डेय और डॉ रविकेश मिश्र ने काव्यपाठ किया। आभार ज्ञापन महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ सिद्धार्थ पाण्डेय ने किया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ गौरव तिवारी ने कहा कि सौंदर्य की सबसे बड़ी विशेषता नव्यता होती है जो अज्ञेय के साहित्य में खूब है। माल्यार्पण डॉ रामभूषण मिश्र, डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र, डॉ राजेश सिंह, डॉ शत्रुघ्न सिंह, ने किया। व्यवस्था संयोजन अशोक मद्धेशिया ने किया। कार्यक्रम में डॉ पी सैम, डॉ उर्मिला यादव, डॉ कुमुद त्रिपाठी, डॉ रेखा त्रिपाठी, डॉ रीना मालवीय, श्री दीपक, डॉ आमोद राय, डॉ अम्बिका तिवारी, डॉ कृष्ण कुमार जायसवाल, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शम्भूदयाल कुशवाहा, डॉ निरंकार राम त्रिपाठी, डॉ पंकज दुबे, डॉ योगेंद्र प्रताप सिंह अभिलाषा, अमृता मल्ल, रागिनी आदि सहित विद्यार्थियों, शिक्षकों और साहित्य प्रेमियों की सहभागिता रही।

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