कसया/कुशीनगर। बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर द्वारा मनोविज्ञान के विद्यार्थियों के लिए एक जागरूकता एवं उन्मुखता कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों को मनोविज्ञान में उप्लब्ध कैरियर विकल्पों तथा उसके लिए आवश्यक कौशल के बारे में सूचित किया गया। “मनोविज्ञान का अध्ययन एवं रोजगार के अवसर” विषय पर बोलते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, नई दिल्ली से आए हुए वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ देवेश नाथ त्रिपाठी ने बताया कि किसी भी विषय मे आगे बढ़ने के लिए ज्ञान और अनुभव दोनो आवश्यक होते हैं।दिमाग के साथ अपने अनुभवों का भी प्रयोग करें, जिसे रिफ्लेक्टिव थिंकिंग कहा जाता है, तभी आप सफल हो सकते हैं। सामान्य जीवन मे हम सोचते तो बहुत हैं पर टालमटोल का रवैया अपनाते हुए उसे व्यवहार में परिणत काम ही कर पाते हैं। एक मनोविज्ञान के विद्यार्थी के रूप में हमसे ये अपेक्षा है कि हम सोचे नही करें और नैतिक मूल्यों का पालन करें।हमारा दृष्टिकोण आलोचनात्मक नही समालोचनात्मक होना चाहिए। हमे दूसरों पर निर्भर होने की बजाए अपनी योग्यता पर विश्वास करना चाहिए। डॉ त्रिपाठी ने बताया कि जिस प्रकार हमारे जीवन मे आर्टिफिशल इंटेलीजेंस हावी होता जा रहा है, हो सकता है कुछ दिनों में मनोविज्ञान भी मशीन हो जाए। हमे मन को मशीन होने से बचाना है, मन का ज्ञान कहीं मशीन का ज्ञान न हो जाए।मनोविज्ञान में असीमित विकल्प हैं आवश्यकता है अपने संसाधनों को जानने और अपनी अभिरुचि के अनुसार उसे पकड़ने की। डॉ त्रिपाठी ने विद्यार्थियों को कैरियर में सफल होने के लिए कुछ मंत्र भी दिए। उन्होंने कहा कि 4 बातों का यदि पालन किया जाए तो कोई भी मंज़िल प्राप्त की जा सकती है ये मंत्र हैं सक्रिय रीडिंग, समय का प्रबंधन, ग्रेड में सुधार और संसाधसनो को समुचित उपयोग। उन्होंने छात्रों को जिज्ञासु बनाने और क्रिटिकली सोचने की सलाह भी दी।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, नई दिल्ली से ही पधारे हुए दूसरे अतिथि वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ राजेश त्रिपाठी ने “भारतीय ज्ञान परंपरा में मनोविज्ञान और कौशल विकास” विषय पर बोलते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में बच्चों को विस्तृत ज्ञान दिया। उन्होंने कहा कि आज देश की सबसे बड़ी समस्या जनसांख्यकीय लाभांश और कौशल का अंतर, स्किल गैप, है। मनोविज्ञान के विद्यार्थियों को न केवल अपनी रुचि, अभिक्षमता और योग्यता को समझना आवश्यक है बल्कि उन्हें अपनी अभिवृत्ति का भी जानना ज़रूरी है। आपने अपने अंदर यदि संज्ञानात्मक, व्यवहारिक और वृत्तिक कौशल विकसित कर लिया तो आपको नौकरी के लिए लाइन में लगने की आवश्यकता नही पड़ेगी बल्कि आप दूसरों को नौकरी देने लायक हो जाएंगे। भारीतय ज्ञान की परंपरा में वो सभी संप्रत्यय दिखते हैं जिन पर विदेशों में आज की तारीख में मनोविज्ञान में सबसे अधिक अध्ययन हो रहा है जैसे चेतना, ध्यान या मैडिटेशन और धनात्मकता या पॉजिटिविटी। डॉ त्रिपाठी ने बहुत से संवादों की भी चर्चा की जिसमे इस ज्ञान परंपरा को देखा जा सकता है जैसे गार्गी और याज्ञवल्क्य, नचिकेता और यम आदि का संवाद। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में मनुष्य भोक्ता रहा है पर आज उसे भोग्य बनाया जा रहा है। हमारी सभ्यता में धर्म बंधता नही वरण खोलता है और हमारे यहां कंडक्ट या कर्म को बहुत महत्व दिया गया है।
कार्यक्रम में अतिथियों का परिचय पूर्व प्राचार्य तथा कार्यक्रम संयोजक प्रो अमृतांशु शुक्ल ने किया। अतिथियों का स्वागत महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो सिद्धार्थ पांडेय द्वारा तथा आभार विभागाध्यक्ष प्रो रामभूषण मिश्रा द्वारा किया गया। संचालन कार्यक्रम की आयोजन सचिव प्रो सीमा त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर विभाग द्वारा कल सेवानिवृत्त हो रहे विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी श्री तूफानी प्रसाद को सम्मानित भी किया गया। इस कार्यक्रम में प्रो कुमुद त्रिपाठी, प्रो रवि पांडेय, डॉ सत्यप्रकाश, डॉ रीना मालवीय, डॉ अनुज कुमार, डॉ इंद्रजीत मिश्र, डॉ अर्जुन सोनकर, डॉ गौरव तिवारी, डॉ राघवेंद्र मिश्र, डॉ निगम मौर्य, डॉ पारस नाथ, डॉ निरंकार राम, डॉ कृष्ण कुमार, डॉ राकेश राय,डॉ दुर्गविजय पाल सिंह, डॉ सी पी सिंह, डॉ राजेश कुमार, डॉ विशेषता मिश्र, डॉ वीरेंद्र साहू, श्री नेबुलाल समेत बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।
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