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कुशीनगर: सूर्य देव औऱ छठी मईया के विशेष आराधना का पर्व है, महापर्व छठ

न्यूज अड्डा डेस्क

Reported By:

Oct 30, 2022  |  8:36 PM

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कुशीनगर: सूर्य देव औऱ छठी मईया के विशेष आराधना का पर्व है, महापर्व छठ
  • परिवार की खुशहाली औऱ उनके लम्बी आयु की मनोकामना की पूर्ति का विशेष महत्त्व है महापर्व छठ का
  • पौराणिक कथाओं व पुराणों से मिलते है इस पर्व के महत्त्व का प्रमाण  

 कुशीनगर । देश भर में मनाया जाने वाला महापर्व छठ कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली पर्व के ठीक बाद मनाए जाने वाले चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि,कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रती पर्व का नाम छठ व्रत गया है । सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है।  पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। छठ पर्व में सूर्य और छठी मैया की पूजा की जाती है, तथा सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। मान्यता के अनुसार सूर्य प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देने वाले देव है, जो कि पृथ्वी पर सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं। भाई -बहन की तरह सूर्य और छठी मैया का संबंध मना जाता है।  पौराणिक कथाओं के अनुसार षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने की थी। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो षष्ठी के दिन विशेष खगोलिय परिवर्तन होता है। तब सूर्य की पराबैगनी किरणें असामान्य रूप से एकत्र होती हैं और इनके कुप्रभावों से बचने के लिए सूर्य की ऊषा और प्रत्यूषा के रहते जल में खड़े रहकर छठ व्रत किया जाता है।पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया या षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं।शास्त्रों के अनुसार षष्ठी देवी को ब्रह्मा  की मानस पुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन्हें माँ कात्यायनी भी कहा गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर होती है। षष्ठी देवी को ही बिहार-झारखंड में स्थानीय भाषा में छठ मैया कहा गया है।यह पर्व चार दिनों तक चलता है। भैया दूज के तीसरे दिन से यह आरंभ होता है। पहले दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। अगले दिन से उपवास आरंभ होता है। इस दिन रात में खीर बनती है। व्रतधारी महिलाये रात में यह प्रसाद लेती हैं। तीसरे दिन डूबते सूर्य को महिलाओ द्वारा अर्घ्य दिया जाता है । अंतिम दिन सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते है l इस पर्व के तीसरे दिन शाम से ही महिलाये विभिन्न पूजन सामग्री लेकर घाटों पर गाजे -बाजे के साथ गीत गाते हुए जाती है औऱ डूबते सूर्य देव को अर्ध्य देकर वापस आती है l दीपावली की तरह इस दिन भी खूब पटाखे फोड़े जाते है l छठ व्रत एक कठिन तपस्या की तरह है। इस में महिला व पुरुष दोनों प्रतिभाग करतें है l  छठ पूजा  से पहले बांस की टोकरी, सूप,बांस या पीतल के बने सूप, थाली, दूध और ग्लास,चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी,नाशपती,  नींबू, शहद, पान,  सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन और मिठाई आदि जुटाना पड़ता है l प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पुड़ी, सूजी का हलवा, चावल के बने लड्डू लिया जाता है l  सूर्य को अर्घ्य देने की विधि भी  बांस की टोकरी में उपरोक्त सामग्री रख कर दिया जाता है तथा  सूर्य को अर्घ्य देते समय सभी प्रसाद सामग्री सूप में रखकर और सूप में ही दीपक जला कर  फिर जलाशयों  में उतरकर सूर्य देव को अर्घ्य देते है ।

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पहला दिन नहाय खाय, व  पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है। दूसरे दिन उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। तीसरे दिन संध्या के समय अर्घ्य डूबते सूर्य को दिया जाता है l ।चौथा दिन उगते सूर्य को अर्घ्य चौथे दिन दिया जाता है l 
रामायण की मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया था। इसी तरह महाभारत की मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था। ऐसी तमाम पौराणिक कथाओं व मान्यताओ के अनुसार महापर्व छठ विशेष महत्त्व रखता है l इस वर्ष भी दीपावली के ठीक बाद मनाये जा रहे छठ पर्व काफ़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है l छठ पर्व पर पूरा क्षेत्र गुलजार है l

प्रशासनिक व जन प्रतिनिधियों द्वारा युद्ध स्तर पर गांव, नगर व क्षेत्र के जलाशयों, पोखरो, तालाबों पर बने छठ घाटों व वेदियों का साफ -सफाई, रंगाई -पुताई, स्वच्छता औऱ सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये हैl हर घाटों पर पुलिस बल  मुस्तैदी के साथ डटे रहे तो वही डीएम, एसपी,एसडीएम, तहसीलदार,  सांसद -विधायक, एवं ग्राम प्रधान, सभासद सहित सभी प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस सभी जनपद के हर क्षेत्रो में भ्रमण कर छठ घाटों की निगरानी व  निरिक्षण कर हर प्रकार से सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेते रहे औऱ समुचित व्यवस्था का दिशा -निर्देश देते रहे l छठ पर्व का नजारा कुशीनगर जनपद के  कसया नगर व ग्रामीण इलाकों में खूब धूम रही l

रविवार की शाम से ही महिलाओ द्वारा घाट पर जाते समय सुरीली गीत, बैंड बाजा, ढ़ोल- नगाड़े, डीजे आदि से पूरा वातावरण गूंज उठा l क्षेत्र में इस दिन दीपावली के उत्साह की तरह पटाखों से पूरा आकाश व वातावरण चका चौध हो उठा l 

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