कुशीनगर। कसया तहसील के कुडवा दिलीपनगर गांव में स्थित कुलकुला देवी स्थान पर नवरात्र के इन दिनों में उमड़ रहे भक्तों की आस्था और श्रद्धा देखती बन रही है। बिना छत वाली मां के नाम से दूर-दूर तक प्रसिद्ध इस स्थान की महिमा का वर्णन पौराणिक धर्मग्रंथों में भी है। तीन नदियों के संगम त्रिमुहानी घाट पर स्थित यह स्थान तंत्र साधकों के लिए खासा महत्व रखता है।
प्रत्येक वर्ष की नवरात्र के दिनों में बिहार व यूपी के कई जिलों से श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए आकर अपनी मनोकामना पूर्ति का वरदान मांगते हैं। कुलकुला स्थान पर देवी के अवतरित होने का श्रेय रहसू गुरु को दिया जाता है। लोगों की धारणा है कि उनके आह्वान पर देवी पश्चिमी बंगाल के कंवरू कमाच्छा स्थान से चली थीं। मान्यता है कि देवी ने यहां मदनपुर जाने के पूर्व क्षण भर विश्राम किया था। नदियों की कलकल ध्वनि के कारण स्थान का नाम कुलकुला देवी पड़ा। देवी पीठ चारों ओर से चारदीवारी से घिरा है। अब तक पीठ पर छत डालने का कोई भी प्रयास सफल नहीं हुआ। किंवदंती है कि छत बनाने का प्रयास जिन भक्तों ने किया, उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। चैत्र नवरात्रि के दिनों में तो इस स्थान पर लगने वाला पशु मेला पूरे यूपी और बिहार में मशहूर था। एक माह तक चलने वाले इस मेले में सूदूर स्थानों से व्यापारी आते थे। देवी स्थान के चार वर्ग किमी क्षेत्र में फैले घने जंगल को वन विभाग ने संजय वन घोषित कर रखा है। स्थान सैकड़ों की संख्या में विचरते लंगूर और मोरों का बसेरा बना हुआ है। काफी संख्या में अजगर, सर्प, हिरन और नीलगाय कौतूहल का विषय बने हुए हैं। स्थल को काफी दिन से पर्यटन क्षेत्र बनाने की मांग भी उठ रही है। पौराणिक ग्रंथों में देवी स्थान की महिमा का वर्णन है। देवी को जंगल प्रिय है। इस नाते इन्हें छत नहीं भाती है। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि केंद्र सरकार के पर्यटन विभाग ने स्थल को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने की योजना बनाई जरूर, पर योजना फाइलों में दबकर रह गई।
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