कसया । खुद के लिए तो हर कोई जीवन जीता है लेकिन कम ही लोग होते हैं,जो दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढते हैं।गुरुवार को पत्रकार राज पाठक ने अपने जन्मदिन पर इसी बात का उदाहरण पेश किया हैं।गुरुवार को इन्होंने अपना जन्मदिन अपने उस परिवार के साथ मनाया, जो इनका न होकर भी इनका अपना है। इन्होंने वृद्धा आश्रम में अपना जन्मदिन मनाया और वहां मौजूद लोगों की पूजा कर अपने हाथों से फल व मिष्ठान की पोटली भेट किया।मौका यदि जन्मदिन का हो और धूमधड़ाके के साथ पार्टी न हो यह बात हजम नहीं होता। लेकिन आज भी कई युवा ऐसे हैं,जो आधुनिकता की चकाचौंध से दूर रहकर बड़ी सादगी के साथ अपना जन्मदिन मनाते हैं। ऐसे ही युवाओं में से एक हैं कसया राज पाठक नाम से मशहुर निर्भीक पत्रकार ,जिन्होंने अपने जन्मदिवस के अवसर पर धूमधड़ाका के साथ पार्टी करने के बजाय दीन-दुखियों की सेवा को प्राथमिकता दी है।पत्रकार राज पाठक ने अपने जन्मदिवस के अवसर पर वृद्धाश्रम कसया में पहुंच कर आश्रम में रह रहे बुजुर्गो के साथ अपना जन्मदिन मनाया। ताकि उन्हें भी महसूस होने वाला एकाकीपन थोड़ा कम हो सके। उन्होंने कहा कि यहां ऐसे लोग हैं जिन्हें अलग-अलग कारण से उनके परिवार ने छोड़ दिया है।ऐसे भी लोग है जिनका अब इस दुनिया में कोई नहीं है। कुछ ऐसे भी हैं जो अपने निजी ज़िंदगी की खुशी इन्हीं के साथबाटते है इनका आशीर्वाद प्राप्त करने इच्छुक रहते हैं।श्री पाठक ने आगे कहा कि महंगे होटलों और रिसोर्ट में जन्मदिन मना कर वो आत्मिक शांति नहीं मिलती जो बेसहारा और गरीब लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखने से मिलती है।साथ ही पत्रकार राज पाठक ने अमरुद का पौधा लगाया व पर्यावरण सरक्षण का संकल्प लिया।इस दौरान इंस्पेक्टर डॉ आशुतोष तिवारी,बृजबिहारी तिवारी,अमित पाठक, अनूप तिवारी, सचिन पाठक,रागनी सिंह रज्जू, विकास श्रीवास्तव, रुचि सिंह, सुजीत कुमार दास, रामा प्रजापति, अनिल पांडेय, रामप्रताप, मनोज पांडेय आदि संस्था के सदस्य गण भी मौजूद रहे।
श्रवण कुमार जैसों की संस्कृति में इधर आ रही गिरावट :- राज पाठक
आज जन्मदिन पर बुज़ुर्गो के चेहरों पर ख़ुशी देखकर मुझे हृदय तल से बड़ा सुकून मिला मुझे लगा की इस कलयुग में श्रवण कुमार जैसों की अपनी भारतीय संस्कृति में भारी गिरावट आ रही है,उन्होंंनेआगे कहा कि ये दुर्भाग्य है कि हमारी संस्कृति कभी ये नहीं रही। हमारे देश में तो श्रवण कुमार जैसे लोग पैदा हुए, और भी बहुत सारी औलादों ने ऐसे कृतिमान स्थापित किए हैं। पता नही क्या वजह है के हमारी संस्कृति में इधर गिरावट आ रही है पूर्वजों के प्रति सम्मान डेवलेप कर सकें। ये हमारी ड्यूटी है, अभी तक तो नैतिकता के आधार पर हम ये सोचते रहे के नैतिक रूप से शायद ये बदल जाए। लेकिन ऐसा नही हुआ तो कड़े प्राविधान और कानून होना चाहिए।
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