कसया/कुशीनगर। बिना किसी अकादमिक सहयोग से, लोकरंग सांस्कृतिक समिति, अपने शोध और संकल्प के बल पर बुद्ध के धरती की लोक संस्कृतियों को अन्तर्राष्ट्रीय मंत्र पर उपलब्ध करा रही है। साथ ही साथ लोकसंस्कृतियों के सामाजिक महत्व को रेखांकित कर रही है। जनमानस के लिए लोक संस्कृतियों का क्या महत्व है, यह लोकरंग पत्रिका से बखूबी जाना जा सकता है।
जहां एक ओर भोजपुरी फिल्में अश्लील गानों को परोस कर युवा वर्ग को विकृत करने में लगी हैं, वहीं लोकरंग सांस्कृतिक समिति ने फूहड़पन के विरूद्ध, जनसंस्कृति के संवर्द्धन के लिए एक मुहीम चला रखा है। शायद अकादमिक जगत को कुशीनगर के करीबी जिले गोपालगंज के महान लोक कलाकार रसूल के बारे में जानकारी न मिल पाती, अगर इस संस्था ने रसूल के मरने के 55 वर्षों बाद, लोक स्मृतियों से उन्हें सहेज न लिया होता। आज इस संस्था की बदौलत देश के तमाम विश्वविद्यालयों और इग्नू में नाटककार रसूल को पढ़ाया जा रहा है। 2023 की लोकरंग पत्रिका तैयार है और उसका लोकापर्ण 15 अप्रैल को लोकरंग मंच पर देश के वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा किया जायेगा। लोकसंस्कृति के क्षेत्र में शोध करने वाले किसी भी शोधार्थी के लिए लोकरंग पत्रिकाएं और किताबें महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं। लोकरंग 2023 पत्रिका का संपादकीय, जे.एन.यू. के पूर्व प्रो. मैनेजर पाण्डेय के भाषणों के सार को समेटे हुए है जो उन्होंने विगत चार बार लोकरंग आयोजन में पधार कर, विचार गोष्ठी में व्यक्त किए थे। लोकरंग की चार पुस्तकें-लोकरंग-1 से लेकर लोकरंग-4 तक, एवं 11 वार्षिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो चुकी हैं।
ये सारी पत्रिकाएं और पुस्तकें, लोकरंग आयोजन के समय जोगिया जनूबी पट्टी में उपलब्ध रहेंगी। जिले के आसपास की लोक संस्कृतियों जैसे फरुवाही, पंवरिया, कबीर और निर्गुण गायन, बाकुम गायन, परंपरागत लोकगीत, बिरहा और जोगी गायन, जांघिया नृत्य, हुड़का और पखावज नृत्य, धोबिया नृत्य और गांव की महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले पारिवारिक गीतों को सहेज का समृद्ध किया है।
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