अहिरौली बाजार/कुशीनगर। पुत्रों के दीर्घायु के लिए माताओं ने आज हल षष्ठी व्रत किया। यह पर्व भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और इसे विशेष रूप से महिलाओं द्वारा संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है।
हलषष्ठी व्रत जिसे ललही छठ भी कहा जाता है।मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है।यह व्रत भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और इसे विशेष रूप से महिलाओं द्वारा संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता है और उन्हीं के नाम पर इस पावन पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा है। हलषष्ठी के दिन माताओं को महुआ की दातुन और महुआ खाने का विधान है।
हल षष्ठी व्रत का विशेष महत्व है।क्योंकि इसे रखने से व्रती महिलाओं के संतान की सुरक्षा और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से संतान को रोग,भय और अनिष्ट से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा,यह व्रत घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाने वाला माना जाता है।
इस दिन व्रती महिलाएं प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद वे कुश में गांठ लगाकर विधि विधान से पूजन-अर्चन किया जाता है। इस दिन हल का उपयोग करने की मनाही होती है।इसलिए व्रती महिलाएं इस दिन बिना हल के निकले हुए अनाज और फलों का ही सेवन करती हैं।
हल षष्ठी व्रत की कथा के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी के जन्म से पहले माता रोहिणी ने यह व्रत रखा था।इस व्रत के प्रभाव से ही बलराम जी को अत्यधिक बलशाली और दीर्घायु होने का वरदान मिला।
एक अन्य कथा के अनुसार एक ग्वालिन दूध दही बेचकर अपना जीवन व्यतीत करती थी।एक बार वह गर्भवती दूध बेचने जा रही थी तभी रास्ते में उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। इस पर वह एक झरबेरी पेड़ के नीचे बैठ गई और वहीं पर एक पुत्र को जन्म दिया।
ग्वालिन को दूध खराब होने की चिंता थी इसलिए वह अपने पुत्र को पेड़ के नीचे सुलाकर पास के गांव में दूध बेचने के लिए चली गई। उस दिन हलछठ का व्रत था और सभी को भैंस का दूध चाहिए था लेकिन ग्वालिन ने लोभवश गाय के दूध को भैंस का बताकर सबको दूध बेच दिया। इससे छठ माता को क्रोध आया और उन्होंने उसके बेटे के प्राण हर लिए।
ग्वालिन जब लौटकर आई तो रोने लगी और अपनी गलती का अहसास किया। इसके बाद सभी के सामने उसने अपना गुनाह स्वीकार कर पैर पकड़कर माफी मांगी। इसके बाद छठ माता प्रसन्न हो गई और उसके पुत्र को जीवित कर दिया।इस वजह से ही इस दिन पुत्र की लंबी उम्र की कामना से हलछठ का व्रत व पूजन किया जाता है।
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