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देश में बेतहासा बढ़ती बेरोजगारी का जिम्मेदार कौन?

न्यूज अड्डा डेस्क

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Jan 23, 2022  |  6:37 PM

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देश में बेतहासा बढ़ती बेरोजगारी का जिम्मेदार कौन?

चौधरी शमसुल होदा (एडवोकेट) की कलम से

  • बेरोजगारी के निदान का सार्थक प्रयास न किया जाना देश में विष्फोटक स्थिति का कारण बन सकता है।

कसया/कुशीनगर। देश की सबसे बड़ी समस्या युवाओं की बढ़ती हुई बेरोजगारी है। जो देश के लिए भविष्य में विष्फोटक साबित हो सकती है। इस वास्तविकता से भाजपा की केंद्र की मोदी सरकार लगायत सभी राष्ट्रिय राजनीतिक पार्टियां भलीभांति परीचित हैं, लेकिन इसे देश का प्रमुख समस्या मानते हुए इसके निदान की दिशा में संकल्पित प्रयास करने की इच्छाशक्ति का आभाव है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के इस निष्कर्ष के प्रति भारत सरकार को विशेष सजगता का परिचय देना चाहिए कि पिछले दो दशक में दुनिया दुनिया भर में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ी है। इस संगठन के अनुसार इस अवधि में बेरोजगार युवकों की संख्या में लगभग बीस प्रतिशत की बृद्धि हुई है। चूँकि इस बीस प्रतिशत में अकेले लगभग पन्द्रह प्रतिशत की बृद्धि दक्षिण एशिया में है। इस लिए यह अनुमान कोई भी लगा सकता है कि भारत में बेरोजगार युवाओं की संख्या सबसे अधिक होगी। सच तो यह है कि राष्ट्रिय स्तर पर ऐसे आंकड़े सामने भी आ चुके हैं कि देश में बेरोजगार युवाओं की संख्या में लगातार बृद्धि होती जा रही है। जब देश में युवा बेरोजगार होंगे तो गरीबी ही नहीं अन्य अनेक समस्याओं का उभरना स्वभाविक है। इस सन्दर्भ में यह कहना अनुचित न होगा कि हमारा देश बेरोजगारों की फौज़ के रूप में एक विस्फोटक स्थिति का सामना करने जा रहा है। यदि इस समस्या का समाधान करने के लिए बड़े पैमाने पर कारगर उपाय नहीं किए गये तो देश में ऐसी स्थिति आ सकती है कि उसका सामना करना कठिन हो जाय।

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हमारा देश भारत इस पर नाज़ कर सकता है और सही माने में उसे करना भी चाहिए कि विश्व में सर्वाधिक युवा अर्थात ऊर्जावान आबादी उसके पास है। लेकिन आखिर जब इन युवाओं के पास कोई काम नहीं होगा तो फिर चारों तरफ समस्याओं के अम्बार के अलावा और कुछ सम्भव नहीं है।
यह चिंताजनक है कि हमारे नीति नियंता फ़िलहाल केवल इतने से सन्तुष्ट हैं कि उनके पास सर्वाधिक युवा अर्थात ऊर्जावान आबादी है। लेकिन यदि इस आबादी को कोई काम नहीं दिया जा सका तो उसकी ऊर्जा का गलत इस्तेमाल भी हो सकता है। यदि ऐसा कुछ हुआ तो जिसे हम अपनी विशेषता मानकर फुले नहीं समा रहे हैं वही हमारे देश के लिए संकट का कारण बन सकती है। यधपि बेरोजगार युवाओं की संख्या में निरन्तर बृद्धि के लिए किसी सर्वेक्षण या अध्यन की जरूरत नहीं है लेकिन पता नहीं क्यों भारत सरकार सामने खड़ी समस्या को भी देखने से इंकार कर रही है। कुछ ऐसा ही रवैया राज्य सरकारों का है। भले ही हमारी आर्थिक विकास दर उल्लेखनीय हो जाय और भारत अर्थ व्यवस्था के लिहाज से तीसरी या चौथी बड़ी ताक़त के रूप में उभर रहा हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास दर देश में बेरोजगारी को दूर करने में सहायक साबित हो रही है?

आखिर यह एक कटु सत्य है कि तथाकथित उल्लेखनीय विकास दर के बावजूद रोजगार के अपेक्षित अवसर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। यह सही है और मैं इसे स्वीकार भी करता हूँ कि सुचना एवं प्रौधोगिक तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो रहे हैं लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सारे बेरोजगार युवाओं को इन्हीं चन्द क्षेत्रों में खपाया जा सके। इस सन्दर्भ में विडम्बना यह है सत्ता पर विराजमान नेता खुलेतौर पर यह कहने लगे हैं कि रोजगार की सम्भावनाओं वाली अनेक क्षेत्रों में योग्य युवाओं का आभाव है। दरअसल हमारे देश में ऐसे युवा सामने नहीं आ पा रहे हैं जो उधोग-व्यापार जगत की जरूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम हों। इसका एक बड़ा कारण उपयुक्त शिक्षा-दीक्षा का आभाव है और रही सही कसर लगातार घटती सरकारी नौकरियों ने पूरी कर दी है। देेेश में स्वरोजगार क्षेत्र को अभी भी अपेक्षित महत्व नहीं मिल पा रहा है। यदि भारत सरकार युवाओं की बेरोजगारी दूर करने के लिए तत्काल प्रभाव से ठोस उपाय नहीं किये तो देश व देशवासिओं के समक्ष गम्भीर समस्याओं का उभरना बिलकुल तय है जो देश के लिए बहुत बड़ी समस्या बन कर अपना विकराल रूप धारण कर सकता है और इससे निपटना मुश्किल हो सकता है। सीएमआईइ, सेंट्रल फ़ॉर मॉनिटरिंग इण्डियन इकॉनमी (भारतीय अर्थव्यवस्था की निगरानी के लिए केंद्र) की रिपोर्ट के अनुसार देश में १५ से ३५ साल की उम्र के युवाओं की संख्या ५० करोड़ से ज्यादा है।

१५ से २५ साल की आयु के शिक्षारत युवाओं की संख्या ३२ करोड़ है। इन्हें शिक्षा के बाद रोजगार मिलेगा या नहीं, यह गम्भीर प्रश्न चिंता का विषय है। ३५ साल के आयु के बेरोजगार युवाओं की संख्या २१ करोड़ है। वर्ष २०१८-१९ में शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में काफी अंतर था, शहरों में १४% था तो ग्रामीण क्षेत्रों में ७ से ७.५% था। सीएमआईइ के ताजा रिपोर्ट के अनुसार आज शहरों में बेरोजगारी दर १४.७१% है तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में १४.३४% हो गया है। सम्पूर्ण भारत में बेरोजगारी का प्रतिशत १४.४५% है। जब किसी भी देश में बेरोजगारी का दर १०% से ज्यादा बढ़ता है तो वहां समाजिक असुरक्षा और सामाजिक असमानता जन्म लेती है। अप्रैल २०२० से अप्रैल २०२१ के बीच जिनकी नौकरी छीन गयी है, उनकी संख्या १८ करोड़ ७० लाख है। अप्रैल २०२० कोरोना के पहले फेज में ११ करोड़ लोगों की नौकरी गयी। अप्रैल २०२१ कोरोना के दूसरे फेज में ७ करोड़ ७० लाख लोगों की नौकरी छीन गयी। दिल्ली शहर को ही लें तो वहां अप्रैल से नवंबर २०२० तक बेरोजगारी दर ६.६% था, जो आज बढ़कर ३५% तक पहुंच गया है।

सत्ताधारी पार्टी नौकरी देती है। बेरोजगारी का फायदा सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने उठाया और लगभग १६ लाख युवाओं को भाजपा के झंडे, बैनर लगाने, नारे लगाने और उस भीड़ हिस्सा बनने जहां शक्ति प्रदर्शन हो, रैली हो के लिए १०० से २०० रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर रख लिया है। यही अंधभक्त बनकर रह रहे हैं। मनरेगा में सबसे न्यूनतम मजदूरी मिलती है, जिसमें ७५% शिक्षित बेरोजगार युवा काम करने को मजबूर हैं। इस बार उसके लिए भी सरकार के पास उपयुक्त बजट नहीं है। पिछले साल कोरोना काल में मनरेगा के बजट ०१ लाख १० हजार करोड़ था। इस वर्ष वह घटकर ५६ हजार करोड़ पर आ गया है।
सरकार सेनक्सन रिक्त पद भर पाने की स्थिति में नहीं है। पिछले छः वर्षों में प्रत्येक वर्ष ०१ लाख भी रोजगार पैदा नहीं कर सकी है भाजपा सरकार. २०१५-२०२१ तक सरकारी आंकड़ों के अनुसार यूपीएससी से २५ हजार २६७, स्टॉफ सलेक्शन कमीशन से ०२ लाख १४ हजार ६०१, रेलवे से ०२ लाख ०४ हजार ९४५ लोगों को रोजगार उपलब्ध हुआ है।केंद्रीय नौकरियों की ०८ लाख ७२ हजार ४५ पद खाली है। पिछले छः वर्षों में ०६ लाख सरकारी नौकरियां चली गयी हैं।ओबीसी, एससी, एसटी की बात करें तो केंद्रीय नौकरियों में एससी के लिए २८ हजार २४५ पद हैं, जिनमें १४ हजार ३६१ पद खाली पड़े हैं। एसटी के १२ हजार ६१२ पद खाली पड़े हैं। ओबीसी के १५ हजार ८८ पद खाली पड़े हैं। ओबीसी के ११४ युवा जो यूपीएससी से आईएएस बने हैं, उनकी ज्वाइनिंग रोक दी गयी है। इसे क्या समाज जाए “गवर्नेन्स का फेल होना” समझें या “सरकार के पास विजन की कमी है” को समझें। ऐसे में देश में जैसे जैसे बेरोजगारी बढ़ेगी और रोजगार उपलब्ध कराने में असफल भाजपा सरकार के समक्ष बेरोजगारी का मुद्दा उठेगा तो सरकार का क्रूर होना स्वभाविक है। भाजपा की मोदी सरकार जो दो करोड़ रोजगार उपलब्ध कराने के घोषणा के साथ केंद्र की सत्ता पर आसीन हुई थी। वह सरकार रोजगार उपलब्ध कराना तो दूर की बात है रोजगार को खत्म करने पर आमादा है। सरकार द्वारा बेरोजगारी के आंकड़े छुपाए जा रहे हैं। ऐसी सरकार से रोजगार की उम्मीद करना बेमानी है। देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तरप्रदेश में सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने १० लाख रोजगार देने व आईटी सेक्टर में २२ लाख प्रोफेशनल को रोजगार देने की घोषणा कर बढ़ती बेरोजगारी को दूर करने के प्रति अपनी सोच को उजागर किया है। जो युवाओं के लिए एक शुभ संकेत है।

बेतहाशा बढ़ती बेरोजगारी को लेकर देश के युवाओं को अपनी लड़ाई स्वंय लड़नी होगी। सत्तापक्ष से बेरोजगारी दूर करने की दिशा में सफल प्रयास करने की मांग करनी होगी। यदि ऐसा नहीं होता है और देश में बढ़ती हुई युवाओं की बेरोजगारी के निदान हेतु सफल व सार्थक प्रयास नहीं किये जाते हैं तो देश के युवाओं समक्ष एक ही विकल्प होगा कि वे स्वयं राजनीतिक प्लेटफॉर्म पर अपने को स्थापित करते हुए युवा क्रांति का विगुल फूंके ताकि देश में बढ़ती बेरोजगारी को लेकर लापरवाह सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंके। देश का शिक्षित युवा वर्ग देश की सत्ता का लगाम स्वयं थामे और देश की मूल समस्याओं के समाधान के लिए आगे आवे। देश में कट्टर साम्प्रदायिकता, दक्षिणपंथी विचारधारा, नफ़रत, बंटवारे, भेदभाव, वर्चस्ववाद, वर्णव्यवस्था, अस्पर्शयता, हिन्दू-मुस्लिम, ऊँच-नीच, दंगा-फसाद की राजनीति करने वालों के खिलाफ जनमानस में एक मुहीम जारी कर इन्हें देश की राजनीतिक धरातल से खदेड़ने का अभियान चलाकर देश, संविधान, लोकतंत्र की रक्षा करना देश के युवाओं का मूल कर्तब्य है। जिसका अब समय आ गया है। देश के युवाओं को जगना होगा और देश की जनता जगाना होगा। अंततः यह कहना उचित होगा कि जो सरकार युवाओं के भविष्य व रोजगार को लेकर गम्भीर नहीं है और जिस सरकार द्वारा बेरोजगारी के आंकड़े छुपाए जा रहे हैं उस सरकार को सत्ता में रहने का कोई हक़ नहीं बनता है।
– चौधरी शमसुल होदा (एडवोकेट)

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