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सलेमगढ़: भगवान के वनवास पर छलक पड़े श्रोताओं के आंसू- अतुल कृष्ण भारद्वाज

Surendra nath Dwivedi

Reported By:

Mar 12, 2021  |  9:14 PM

788 लोगों ने इस खबर को पढ़ा.
सलेमगढ़: भगवान के वनवास पर छलक पड़े श्रोताओं के आंसू- अतुल कृष्ण भारद्वाज WhatsApp
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  • सलेमगढ़ में रामकथा की अमृत वर्षा का छठवा दिन

तमकुहीराज/कुशीनगर।भगवान श्रीराम ने अपने कुल की मर्यादा को ध्यान में रखकर अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए प्रसन्न होकर सारा राज – पाठ त्याग कर वन चले गये। इस प्रसंग को सुनते ही पंडाल में उपस्थित लोग भावभिभोर हो गए।

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उक्त बातें शुक्रवार को वृंदावन से पधारे व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज ने कही। कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अच्छे कार्यों को टालने की जगह शीघ्र करना ही श्रेयष्कर होता है। सभी को सदैव प्रसन्न रहने की प्रेरणा भगवान श्रीराम से लेनी चाहिए। भगवान जहां भी रहते हैं प्रसन्न रहते है, दुख उनसे कोसों दूर रहता है । कथा के रसपान कराते हुए कहा कि मॉ कौशिल्या में किसी ने दोषी नहीं बताया बल्कि कहा कि यदि माँ कैकयी बन जाने को कहा। लेकिन कैकयी कहती है कि सुख और दुख तो अपने ही कारणों से होते हैं। भाई हो तो लक्ष्मण जैसा जब श्रीराम बनवास जा रहे थे तब लक्ष्मण ने अपनी माता से कहा कि मैं भी वनवास जाना चाहता हूं। तो माँ ने कहा कि मैं तो जन्म ही दी हूँ पर तुम्हारी अपनी माता कौशल्या से जाकर आदेश लो वही तुम्हें आदेशीत करेगी। वहां भाई प्रेम देखकर आदेश मिल ही गया। जब भगवान श्रीराम लखन एवं सीता सहित वन गमन के लिए निकले तो सभी अयोध्यावासी अपने अपने घरों से भगवान के पीछे निकल पड़े। व्यास जी ने यह प्रसंग सुनाया गया तो पण्डाल में उपस्थित सभी श्रोताओं के आंख में आँख से आंसू छलक पड़े । रामचरित मानस में माँ कैकेयी बहुत ही महान पात्र है यदि माँ कैकेयी नहीं होती तो रामकथा बाल काण्ड में ही समाप्त हो जाती है। कैकेयी माँ ने ममता में साहस भर कर पुत्र के प्रति कठोर स्नेह का दर्शन कराया है। माँ कैकेयी अगर राम को वनवास नहीं कराती तो अखण्ड भारत में रामराज्य की स्थापना नहीं हो पाती । ममता में तनिक कठोरता का होना अनिवार्य है। मर्यादा पुरूषोत्तम बनाने में माँ कैकेयी ने अपना अनुराग , भाग और सुहाग सब कुछ समर्पित कर दिया। माता सीता पति धर्म के लिए अयोध्या का सुख छोड़ दिया भैया लखन भाई की सेवा धर्म को निभाने के लिए सम्पूर्ण वैभव सुख छोड़कर श्रीराम एवं माँ सीता की सेवा में चौदह वर्ष अपना जीवन वन में बिताया। राम वनवास के समय सभी ने अपने अपने धर्म पर चलकर आज के समाज को सभी मार्ग दर्शन दिया है । इस दौरान सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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