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हिंदी के महान साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की 112 वीं जयंती

न्यूज अड्डा डेस्क

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Mar 7, 2023  |  5:22 PM

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हिंदी के महान साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की 112 वीं जयंती

कसया/कुशीनगर। बुद्ध की धरती कुशीनगर में जन्में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ भारत की उस वैचारिक चिंतन परम्परा के प्रतिनिधि साहित्यकार और विचारक हैं जो विचारधारा की कट्टरता के आग्रह से मुक्त रही है।

उक्त विचार बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर गौरव कुमार तिवारी ने हिंदी के महान साहित्यकार अज्ञेय के 112 वें जन्मदिवस के अवसर कही। उनकी रचनाएँ व्यक्तित्व और वैचारिकी की मुक्ति का उद्घोष करती हैं। उन्होंने साहित्य और कला के निर्माण और आस्वादन की प्रक्रिया पर खूब लिखा है। स्वतंत्रता और सृजन उनकी रचनाओं के केंद्र में है। इन अर्थों में उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि वे पूर्वग्रह मुक्त चिंतन परम्परा के सोपान हैं जो भारतीयता की अवधारणा को आगे बढ़ाती है। अज्ञेय के साहित्य में बौद्ध दर्शन और धर्म परम्परा के जो चिह्न हैं वे कुशीनगर में जन्म होने के कारण उनकी पहली सांस के साथ उनके अंदर प्रवेश का परिणाम हैं, इस बात को उन्होंने अनेकशः कहा भी है। अज्ञेय जी का जन्म 7 मार्च 1911 को बुद्ध स्थली कुशीनगर में हुआ था। तब उनके पिता हीरानंद शास्त्री पुरातत्व विभाग की ओर से कुशीनगर के ऐतिहासिक पुरावशेषों का खनन कार्य संपादित करा रहे थे। उनका बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। वह हिन्दी में अपने समय के सबसे चर्चित कवि, कथाकार, निबन्धकार, पत्रकार, सम्पादक, यायावर, अध्यापक रहे हैं। अज्ञेय संवेदनशीलता इतनी गहरी है कि उनकी नजर उन भुला दिये गए उन लोगों पर भी जाती है जिन्होंने बड़ी बड़ी उपलब्धियों की भूमिका बनायी है लेकिन उनका कोई नाम तक नहीं लेता। उन्हें नकार या भुला दिया जाता है। वे कहते हैं- जो पुल बनाएँगे/वे अनिवार्यत:/पीछे रह जाएँगे। सेनाएँ हो जाएँगी पार/मारे जाएँगे रावण/जयी होंगे राम,/जो निर्माता रहे इतिहास में/ बन्दर कहलाएँगे। कवि कर्म को अज्ञेय बहुत ही महत्वपूर्ण मानते हैं।

उनका मानना है कि कविता का दायित्व इतना बड़ा है कि कविता का निर्माण करना आग में जलने के समान है वे कहते हैं- कवि का है भाग यही/ आग से आग तक/जलना गलना/गलाना मन्दिर जिसका भी हो/प्रतिमा बनाना-बैठाना नहीं-/प्रतिमा के प्राणों को सुलगाना। प्रो0 श्री तिवारी ने महान हिंदी साहित्यकार को नमन करते हुए कहा कि कुशीनगर में अज्ञेय के लिखे साहित्य, विचारों पर परिचर्चा, चिंतन, शोध को बढ़ावा देना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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