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सृष्टि की रचना व उसे सुन्दर बनाने में भगवान श्री विश्वकर्मा जी का योगदान!

न्यूज अड्डा डेस्क

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Sep 17, 2020  |  4:02 AM

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सृष्टि की रचना व उसे सुन्दर बनाने में भगवान श्री विश्वकर्मा जी का योगदान!

सृष्टि की रचना व उसे सुन्दर बनाने में भगवान श्री विश्वकर्मा जी का योगदान

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भारतवर्ष में कोई ऐसा स्थान या व्यक्ति नहीं हैं। जिन्होने भगवान श्री विश्वकर्मा जी का नाम ना सुना हो। भगवान श्री विश्वकर्मा जी के विषय में कहा जाता है कि इन्होनें ही सृष्टि की रचना की है। जैसा कि विश्वकर्मा शब्द का अर्थ है भगवान श्री विश्वकर्मा जी विश्व की रचना करने वाला अर्थात कर्म का सम्बन्ध कर्ता से है। बिना कर्ता के कर्म की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अतः सृष्टि की रचना करने वाले को ही विश्वकर्मा कहा गया है। विश्वकर्मा कौन थे, सृष्टि के पहले हुए या बाद में। इस विषय में वेदों से लेकर अनेक पुराणों में भगवान श्री विश्वकर्मा जी के बारे में बताया गया है। जो संक्षेप में इस प्रकार हैः-
1 भगवान श्री विश्वकर्मा जी को भुवन पुत्र कहा जाता है। कोई विद्वान भुवन का अर्थ पृथ्वी लेकर सीधे पृथ्वी से इनकी उत्पति मानते है। कहा जाता है कि ईश्वर किसी भी रूप में कहीं से भी प्रकट हो सकते है। जिस प्रकार प्रहलाद भक्त की रक्षा के लिए भगवान लोहे के खम्भे से प्रकट हुए थे। दूसरी मान्यता के अनुसार भगवान श्री विश्वकर्मा जी का जन्म महर्षि अंगिरा जिन्होनें अथर्ववेद की रचना की थी की पुत्री भुवना जो ब्रहम विद्या में निपुण थी। इसकी शादी आठवें वसु महर्षि प्रभास से हुई थी। इन्होने अपने पुत्र का नाम प्रजापति विश्वकर्मा रखा था। पुराणो के इस श्लोक से इसकी पुष्टि होती है।
बृहस्पते भगनी भुवना ब्रह्मवादिनी।
प्रभासस्य तस्य भार्या बसूूनामष्टस्य च।
विश्वकर्मा सुतस्तस्यशिल्पकर्ता प्रजापति।।

ऋुग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त के नाम से 11 मन्त्र है जिनमें विश्वकर्मा जी को भौवन का देवता आदि कहा गया है। यजुर्वेद के 17 वें अध्याय में 16 से 31 मंत्रो में विश्वकर्मा को सूर्य और इंद्र का विशेषण रूप दिया गया है। कुछ विद्वानों ने विश्वकर्मा जी को भगवान विषणु जी की नाभि से उत्पति मानकर ही विष्णु से विश्वकर्मा का जन्म मानते है। कहीं कुछ विद्वान ब्रह्म को ही विश्वकर्मा तथा ब्रह्म जी के पाँच मुखों को विश्वकर्मा के पाँच पुत्र मानते है। जिन्होनें अपनी-2 कला और कौशल से सृष्टि की सुन्दर रचना की है। इनके पाँच पुत्रों का परिचय इस प्रकार हैः-
1 मनुः- इन्होनें लोहे की खोज की। आवश्यकतानुसार इन्होनें लोहे के औजार, अस्त्र-शस्त्र तथा अनेको उपयोगी वस्तुएँ बनाई। इनके वंशज, लुहार या पांचाल कहलाते है।
2 मयः- ये विश्वकर्मा की दूसरी संतान है। इन्होनें लकडी का काम सम्भाला इनके वंशज बढई व धीमान कहलाते है।
3 त्वष्टाः- ये विश्वकर्मा की तीसरी संतान है। इन्होनें तांबे,कांसे और सिल्वर का कार्य अपने हाथो में लिया। उस समय तांबे,पीतल और सिल्वर के बर्तन काम में लाए जाते थे। इनके वंशज ठठेरे कहलाए।
4 दैवज्ञः-ये विश्वकर्मा की चैथी संतान है। इन्होनें सोने,चांदी और जवाहरात के आभूषण बनाने का कार्य सम्भाला। इनके वंशज सुनार कहलाए।
5 शिल्पीः- ये विश्वकर्मा की पाँचवी संतान है। इन्होर्नें इंटो से मकान बनाना, पत्थरो से मूर्तियाँ बनाना तथा विभिन्न धातुओ पर मूर्ति आदि बनाना। इनके वंशज शिल्पकार कहलाए। अलग-2 स्थानो पर इन्हें अलग-2 नामो से जाना जाता है। कहीं धीमान कहीं सुथार तो कहीं राजमिस्त्री।
विश्वकर्मा वंशियों का योगदानः-
प्राचीन काल में जो शहर बनते थे और राजधानियाँ बनती थी, उन सभी का निर्माण विश्वकर्मा की ही देन है।
त्रेता युग में सोने की लंका का निर्माण भी विश्वकर्मा जी ही ने किया था। समुंद्र पर पुल का निर्माण भी नल और नील जो विश्वकर्मा वंशी थे के द्वारा ही किया गया था। द्वापर युग में श्री कृष्ण की द्वारिकापुरी और सुदामा पुरी की सुन्दर रचना भी श्री विश्वकर्मा जी द्वारा ही की गई थी। खाण्डवप्रस्थ को सुन्दर इन्द्रप्रस्थ बनाने में भी श्री विश्वकर्मा जी के पुत्रों का योगदान रहा था।
कलियुग के अन्दर हस्तिनापुर का निर्माण राजाओ के लिए महल व किलों का निर्माण भी विश्वकर्मा जी के पुत्रों द्वारा ही हुआ है।
प्राचीन ग्रन्थों के पठन-पाठन से यह विदित हुआ है कि जहाँ ब्रह्म,विषणु और महेश की वन्दना की गई वहीं पर गृह प्रवेश और किसी भी प्रकार के यज्ञ में सर्वप्रथम श्री विश्वकर्मा जी की पूजा होती रही है। कहा जाता है कि जगननाथ पुरी में कृष्ण , सुदामा और बलराम की विशाल मूर्तियों का निर्माण भी स्वंय श्री विश्वकर्मा जी ने ही किया था।
सर्वप्रथम पुष्पक विमान का निर्माण श्री विश्वकर्मा जी ने ही किया था। सभी धर्मो में श्री विश्वकर्मा जी को निर्माण एंव सृजन का देवता माना गया है। विदेशो में इनकी पहचान ळवक व ज्मिबीदपुनम अर्थात तकनीकी के देवता के रूप में है। विश्वकर्मा सर्वकला सम्पन्न और सर्वव्यापक है।
वेदो में बताया हैः-
विश्वतः चक्षुवतः विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरूत विश्वस्पातः
विश्वकर्मा जी ने अलग-2 समय में सृष्टि को सुन्दर बनाने का कार्य किया है। जिन लोगों ने विश्वकर्मा जी के गुणों को धारण करके निर्माण व सृजन तथा शिल्प कर्म को अपनाया है वे सभी विश्वकर्मा कहलाए। वर्तमान युग में विश्वकर्मा कोई जाति नहीं अपितु व्यवसाय बन गया है। आज लोहे व लकडी के काम करने वाले लुहार या बढई नही कहलाते। यदि ऐसा होता तो टाटा सबसे बडे लुहार कहलाते।
आज देश और विदेशों में बहुत से कारखाने अनेक प्रकार की वस्तुओं के निर्माण में कार्य कर रहे है। उनके अन्दर काम करने वाले इन्जीनियर एवं कारीगरों में विश्वकर्मा जी केे गुण हंै। वें सभी विश्वकर्मा जी को निर्माण,सृजन एवं शिल्पकला के देवता के रूप में याद करते हैं। भारत में विश्वकर्मा जी की वर्ष में पाँच बार पूजा की जाती है।

(1) भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा के दिन शिलांग और पूर्वी बंगाल में विश्वकर्मा जी की पूजा की जाती है।
(2) गोवर्धन पूजा- यह पूजा दीपावली से अगले दिन अन्नकूट का प्रसाद तैयार करके सभी अपने-2 काम के औजारों की पूजा करके विश्वकर्मा जी की आरती करते हैं।
(3) मई दिवस के रूप में – इस दिन सोवियत रूस में कारखानों में काम करने वाले मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए लम्बी लडाई लडी और विजय प्राप्त की। यह लडाई इतिहास में रूसी क्रान्ति के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस दिन दुनिया के मजदूर विश्वकर्मा जी की पूजा करके अपनी जीत का जश्न मनाते हैं।
(4) माघ शुक्ल़ त्रयोदशी- ऐसा माना जाता है कि इसदिन पृथ्वी पर विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ था। इसदिन सभी विश्वकर्मा वंशी एकत्र होकर यज्ञ आदि करके भगवान श्री विश्वकर्मा जी की पूजा आराधना करते हंै।
(5) 17 सितम्बर- इस दिन सभी सरकारी और गैर-सरकारी इन्जीनियरिंग संस्थानों और कारखानों में मशीनों एवं औजारों की सफाई करके उनकी विषेश पूजा की जाती है। इस दिन कहीं-2 पर भंडारे का भी आयोजन किया जाता है। मालिक लोग इस दिन अपने मेहनती कर्मचारियों को ईनाम भी देते हैं। आज भी राजमिस्त्री , लकडी के कारीगर और शिल्पकार अमावश्या के दिन उपवास रखते है। अपने औजारों की पूजा करके विश्राम करते है। प्राचीन समय में और वर्तमान समय में संसार की जो भी सुन्दरता दिखाई देती है उसका श्रेय भगवान विश्वकर्मा जी को उनके पुत्रों को विश्व कर्म को अपनाने वाले अभियन्ताओं को जाता है।

विश्वकर्मा वंशी बालक जन्मजात इंजीनियर होता है। निर्माण, सृजन व शिल्प उसे विरासत में प्राप्त होती है। जिस प्रकार अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदन का ज्ञान माता के उदर में ही प्राप्त हो गया था।
विश्वकर्मा वंशियों का इतिहास परिश्रम और ईमानदारी का रहा है। इनके परिश्रम के बदले इन्हें जो भी मिलता है। उसी में संतुष्ट रहकर कार्य करते रहते हैं।
किसी भी विश्वकर्मा वंशियों के अंदर चापलूसी, आलस और अकर्मण्यता कभी दिखाई नहीं दी और न ही देगी। यह स्वाभिमानी वंश अपने स्वाभिमान के लिए सदा अपने कर्तव्य पथ पर बढता रहा है और बढता रहेगा।
वास्तुशास्त्र और वास्तुकला
वास्तुशास्त्र के जनक देवशिल्पी विश्वकर्मा जी ही है। जिन्होने लोक मंगल की कामना करते हुए वास्तुशास्त्र का विधान बनाया। इसका वर्णन ऋग्वेद के दशम् अध्याय के 31 व 32 मन्त्रों में मिलता है। विश्वकर्मा जी तकनीकी ज्ञान विज्ञान के जनक के साथ-2, जल विद्युत व प्रकाश ऊर्जा के भी जनक है।

जगद् रचन् विश्व कर्म न्नैश्वराय नमः
बुलावे भारत की संतान, पधारो श्री विश्वकर्मा भगवान।
तुम निर्विकार हो स्वामी, सब जग के अन्तर्यामी।
जग का करते हो कल्याण, पधारो श्री विश्वकर्मा भगवान।।
राम असरे विश्वकर्मा, (पूर्वमंत्री)
राष्ट्रीय अध्यक्ष- अखिल भारतीय विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा।

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