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ऐतिहासिक पाठशाला में भविष्य का संकट: पांच कक्षाओं पर एक शिक्षामित्र, 31 बच्चों की पढ़ाई भगवान भरोसे सोहंग के 106 साल पुराने प्राथमिक विद्यालय में शिक्षकों का टोटा, दो अध्यापिकाएं मातृत्व अवकाश पर; नवनिर्मित शौचालय पर ताला, दो कमरों में सिमटी पांच कक्षाओं की पढ़ाई

Surendra nath Dwivedi

Reported By:

Sep 21, 2026  |  7:32 PM

19 लोगों ने इस खबर को पढ़ा.
ऐतिहासिक पाठशाला में भविष्य का संकट: पांच कक्षाओं पर एक शिक्षामित्र, 31 बच्चों की पढ़ाई भगवान भरोसे सोहंग के 106 साल पुराने प्राथमिक विद्यालय में शिक्षकों का टोटा, दो अध्यापिकाएं मातृत्व अवकाश पर; नवनिर्मित शौचालय पर ताला, दो कमरों में सिमटी पांच कक्षाओं की पढ़ाई

फाजिलनगर। जिस ऐतिहासिक पाठशाला ने कभी क्षेत्र को गौरवान्वित करने वाली विभूतियों को प्राथमिक शिक्षा की नींव दी, आज वही विद्यालय खुद शिक्षकों और मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। वर्ष 1920 में स्थापित सोहंग प्राथमिक विद्यालय में वर्तमान समय में महज 31 बच्चों का नामांकन है। विद्यालय में तैनात दो सहायक अध्यापिकाएं लंबे समय से मातृत्व अवकाश पर हैं। ऐसे में कक्षा एक से पांच तक के बच्चों की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी फिलहाल एकमात्र महिला शिक्षामित्र के कंधों पर है।

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सबसे गंभीर बात यह है कि दोनों अध्यापिकाओं के लंबे अवकाश के बावजूद अब तक वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था नहीं हो सकी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द अतिरिक्त शिक्षक की तैनाती नहीं हुई तो शैक्षिक सत्र का महत्वपूर्ण समय बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने में ही गुजर जाएगा।
जिस पाठशाला ने दीं बड़ी विभूतियां, आज खुद शिक्षक को तरस रही
सोहंग की यह पाठशाला केवल एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय नहीं, बल्कि एक सदी से अधिक पुरानी शैक्षिक विरासत है। इसी विद्यालय से पूर्व केंद्रीय मंत्री पं. राजमंगल पांडेय ने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की थी। बाद में केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने पूर्वांचल में रोजगार और विकास के क्षेत्र में योगदान दिया। क्षेत्र में उन्हें विकास कार्यों के लिए याद किया जाता है।
इसी विद्यालय से जुड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. रामधारी शास्त्री ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया, यातनाएं सहीं और कई बार जेल गए। आजादी के बाद उन्होंने राज्य मंत्री और सांसद के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई।
ऐसी गौरवशाली शैक्षिक विरासत वाले विद्यालय की वर्तमान स्थिति ग्रामीणों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
दो अध्यापिकाएं अवकाश पर, एक शिक्षामित्र के जिम्मे पांच कक्षाएं
विद्यालय में दो सहायक अध्यापिकाओं के साथ एक महिला शिक्षामित्र तैनात हैं। दोनों सहायक अध्यापिकाएं लंबे समय से मातृत्व अवकाश पर हैं। इनमें से एक के पास प्रधानाध्यापिका का प्रभार भी है। बताया जा रहा है कि दोनों की वापसी दिसंबर के दूसरे पखवाड़े तक संभावित है।
ऐसे में फिलहाल कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी अकेली शिक्षामित्र पर आ गई है। शिक्षण कार्य के साथ विद्यालय से जुड़े विभागीय एवं अन्य आवश्यक कार्य भी उन्हीं को संभालने पड़ रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह एक-दो दिन की आकस्मिक समस्या नहीं है। जब यह पहले से स्पष्ट है कि दोनों अध्यापिकाएं लंबे समय तक अवकाश पर रहेंगी, तब वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अतिरिक्त शिक्षक की तैनाती क्यों नहीं की गई, यह बड़ा सवाल है।
घनी आबादी वाले गांव में 31 बच्चों तक सिमटा नामांकन
सोहंग जैसे घनी आबादी वाले गांव के ऐतिहासिक विद्यालय में बच्चों का नामांकन महज 31 तक सिमट जाना भी चिंता का विषय है। ग्रामीणों के अनुसार शिक्षकों की कमी, सीमित भवन और मूलभूत सुविधाओं के अभाव का असर अभिभावकों के भरोसे पर पड़ा है।
ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने की उम्मीद में कई अभिभावक उन्हें निजी विद्यालयों की ओर भेज रहे हैं। शिक्षकों की कमी के बीच इस सत्र में ‘स्कूल चलो अभियान’ भी अपेक्षित रूप से नहीं चल सका। उनका मानना है कि विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक, कमरे और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों तो सरकारी स्कूल के प्रति अभिभावकों का विश्वास फिर मजबूत हो सकता है।
शौचालय बना, लेकिन नौनिहालों के लिए दरवाजे पर ताला
विद्यालय में लंबे समय से मांग के बाद हाल ही में शौचालय का निर्माण कराया गया, लेकिन निर्माण के बाद उसके दरवाजे पर ताला लगा हुआ है। यानी सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद बच्चे उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।
बरसात और उमस के मौसम में खुले अथवा झाड़ियों वाले स्थानों पर जाने की स्थिति बच्चों की स्वच्छता और सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों ने शौचालय को तत्काल उपयोग के लिए खोलने की मांग की है।
विद्यालय में पेयजल के लिए सरकारी हैंडपंप प्रमुख साधन है। ग्रामीणों ने हैंडपंप के पानी की नियमित जांच कराने और बच्चों के लिए सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने की भी मांग की है।
न डाइनिंग शेड, न हैंडवाशिंग यूनिट, न बच्चों के लिए स्थायी मंच
विद्यालय में मध्याह्न भोजन के लिए डाइनिंग शेड की भी कमी है। भोजन से पहले और बाद हाथ धोने के लिए मल्टीपल हैंडवाशिंग यूनिट नहीं है। वहीं राष्ट्रीय पर्वों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विद्यालयी आयोजनों में बच्चों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए स्थायी मंच तक उपलब्ध नहीं है।
ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालयों में बच्चों को बेहतर शैक्षिक वातावरण देने के लिए सरकार की ओर से विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन सोहंग की इस ऐतिहासिक पाठशाला में अभी भी कई बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं।
पांच कमरों से दो कमरों में सिमटी पढ़ाई
एक समय विद्यालय में कक्षा एक से पांच तक के लिए अलग-अलग कमरे उपलब्ध थे। पुराने भवन के जर्जर होने के बाद उसे ध्वस्त कर दिया गया। वर्तमान में पांचों कक्षाओं की पढ़ाई महज दो पक्के कमरों में संचालित हो रही है।
सीमित कमरों के साथ शिक्षकों की कमी ने पढ़ाई की चुनौती को और बढ़ा दिया है। अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को सीमित स्थान में पढ़ाने की स्थिति से शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की बात ग्रामीणों ने कही है।
उमस भरे मौसम में बिजली की आवाजाही के बीच वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं है। विद्यालय में लगा एकमात्र पंखा बिजली जाने के साथ ही बंद हो जाता है। ऐसे में बच्चों को गर्मी और उमस के बीच बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है।
अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी उठे सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय में शिक्षकों और मूलभूत सुविधाओं की कमी कोई नई समस्या नहीं है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग की ओर से अब तक वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि इस समस्या के समाधान की जिम्मेदारी केवल विभागीय अधिकारियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। स्थानीय एवं क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को भी ऐतिहासिक विद्यालय की स्थिति को गंभीरता से लेते हुए संबंधित विभाग के समक्ष शिक्षकों, अतिरिक्त कक्ष और मूलभूत सुविधाओं की मांग उठानी चाहिए।
ग्रामीण बोले—अब आश्वासन नहीं, चाहिए ठोस व्यवस्था
गांव के प्रबुद्धजन अनीश पांडेय, शहाबुद्दीन अंसारी, रामनरेश सिंह, हीरा सैनी, बिपिन पांडेय, जयनारायण सिंह, गुड्डू सिंह, रामप्रकाश पांडेय, गुड्डू यादव, फणिस पांडेय व अशरफ अंसारी समेत अन्य ग्रामीणों ने विद्यालय की स्थिति पर चिंता जताई।
ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1920 में शुरू हुई इस पाठशाला ने एक सदी से अधिक समय तक गांव में शिक्षा की नींव मजबूत की और यहां से निकली विभूतियों ने क्षेत्र का नाम रोशन किया। इसके बावजूद आज उसी विद्यालय में पांच कक्षाओं की पढ़ाई एक शिक्षामित्र के भरोसे चलना गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि दोनों सहायक अध्यापिकाओं के लंबे समय तक अवकाश पर रहने की स्थिति को देखते हुए तत्काल वैकल्पिक शिक्षक की तैनाती की जानी चाहिए। इसके साथ ही शौचालय को उपयोग योग्य कराने, पेयजल की जांच, डाइनिंग शेड, हैंडवाशिंग यूनिट, अतिरिक्त कक्ष और बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था भी कराई जाए।

अब निगाहें शिक्षा विभाग पर हैं कि वह इस ऐतिहासिक विद्यालय की स्थिति का संज्ञान लेकर कब तक वैकल्पिक शिक्षक की तैनाती और मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था करता है। सवाल केवल एक विद्यालय का नहीं, बल्कि उन 31 नौनिहालों की पढ़ाई और भविष्य का है, जो आज भी इसी पाठशाला से अपने सपनों की पहली सीढ़ी चढ़ रहे हैं।

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