गोरखपुर। गोरखपुर परिक्षेत्र में परिवहन विभाग की एक बड़ी अनियमितता सामने आई है। आरटीओ गोरखपुर के अधीन परिवहन अधिकारियों द्वारा नियमों को दरकिनार करते हुए 173 भारी वाहनों (ट्रकों) का ग्रास व्हीकल वेट (GVW) बढ़ाया गया। प्रारंभिक जांच में 123 वाहनों में वजन बढ़ाए जाने की पुष्टि हो चुकी है। शेष मामलों की फाइलें खंगाली जा रही हैं। मामला सामने आते ही परिवहन विभाग में हड़कंप मच गया है।
यह खुलासा सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी से हुआ है। कुशीनगर निवासी मृत्युंजय ठाकुर ने 16 चक्का ट्रकों के ग्रास व्हीकल वेट में कथित बढ़ोतरी को लेकर परिवहन विभाग से सूचना मांगी थी। विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी चौंकाने वाली निकली। मामला गोरखपुर आरटीओ कार्यालय से होते हुए उप परिवहन आयुक्त कार्यालय वाराणसी और परिवहन आयुक्त कार्यालय लखनऊ तक पहुंच गया है।
परिवहन मंत्रालय व केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार किसी भी वाहन का अधिकृत भार (GVW) निर्धारित करने अथवा उसमें परिवर्तन करने का अधिकार केवल वाहन निर्माता कंपनी को है। इसके बावजूद गोरखपुर व देवरिया के परिवहन अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी कर निर्माता द्वारा तय सीमा से अधिक वजन दर्ज कर दिया, जो कानूनन प्रतिबंधित है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार 11 जून 2025 को तत्कालीन संभागीय निरीक्षक (प्राविधिक) द्वारा ट्रक यूपी 53 केटी 9546 का ग्रास व्हीकल वेट पंजीकरण के समय 49,000 किलो से बढ़ाकर 51,000 किलो दर्ज किया गया। इसी दिन यूपी 53 केटी 9547, 9548 और 9549 का वजन भी 49 टन से बढ़ाकर 51 टन कर दिया गया।
इसी तरह 30 अगस्त 2023 को ट्रक यूपी 53 एफटी 2349 तथा 1 सितंबर 2023 को यूपी 53 एफटी 2358 का ग्रास व्हीकल वेट 49 टन से बढ़ाकर 51 टन किया गया।
देवरिया में मामला और गंभीर है, जहां सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी द्वारा ट्रक यूपी 52 बीटी 2329 व यूपी 52 बीटी 2330 का पंजीकरण करते समय 47,500 किलो से बढ़ाकर 53,500 किलो तक ग्रास व्हीकल वेट दर्ज कर दिया गया, जो परिवहन मंत्रालय द्वारा तय अधिकतम भार सीमा से कहीं अधिक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की ओवरलोडिंग सड़क सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। अधिक भार वाले वाहनों से दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है और सड़कों को भी नुकसान पहुंचता है। इसके बावजूद नियमों को ताक पर रखकर वजन बढ़ाया गया।
मामले में संबंधित अधिकारियों की ओर से यह तर्क दिया गया है कि वजन में यह परिवर्तन विभागीय राजस्व हित में किया गया तथा इससे किसी प्रकार का व्यक्तिगत लाभ नहीं हुआ। हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि यदि यह व्यवस्था राजस्व हित में थी तो केवल कुछ चुनिंदा ट्रकों तक ही क्यों सीमित रही और इसे प्रदेश भर में लागू क्यों नहीं किया गया।
फिलहाल परिवहन विभाग द्वारा पुरानी फाइलों की गहन जांच की जा रही है। अब देखना यह है कि आरटीओ गोरखपुर सहित जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होती है या यह मामला कागजी जांच तक ही सीमित रह जाता है।
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