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अलग होने के बाद पत्नी करती है सुसाइड तो पति के खिलाफ नहीं बनता उकसाने का मामला: इलाहाबाद हाई कोर्ट

न्यूज अड्डा डेस्क

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Sep 22, 2021  |  10:34 AM

883 लोगों ने इस खबर को पढ़ा.
अलग होने के बाद पत्नी करती है सुसाइड तो पति के खिलाफ नहीं बनता उकसाने का मामला: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसला दिया, जिसमें अदालत ने यह परिभाषित किया है कि पत्नी को यदि पति अपने जीवन से अलग करता है तो इसमें आत्महत्या के लिए उकसाने का केस नहीं बनता. हाई कोर्ट ने पत्‍नी की आत्‍महत्‍या के मामले में न‍िचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए पति को राहत देते हुए यह टिप्पणी की. हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया.

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न्यायमूर्ति अजय त्यागी की पीठ के समक्ष जगवीर सिंह उर्फ​ बंटू ने एक अपील दायर कर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पीलीभीत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए (दहेज उत्पीड़न- Harassment for Dowry) और 306 (Abetment of Suicide) के तहत दोषी ठहराया गया था. शिकायतकर्ता ने 14 दिसंबर, 2008 को थाना-जहानाबाद, जिला-पीलीभीत में एक लिखित​ शिकायत दी थी, जिसमें कहा गया था कि उसकी पोती की हत्या हुई है.

मृतका के दादा ने दी थी दामाद के खिलाफ लिखित तहरीर
शिकायतकर्ता ने पुलिस को दी तहरीर में लिखा था कि उसकी पोती की शादी जगवीर सिंह से हुई थी. जगवीर और उसके माता-पिता शादी में दिए गए दहेज से संतुष्ट नहीं थे और अतिरिक्त दहेज की मांग कर रहे थे. उनकी डिमांड पूरी नहीं करने पर मेरी पोती को प्रताड़ित किया गया और उसे जहर देकर मार डाला गया. पुलिस ने मृतका द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट को केस में मुख्य आधार माना था. सुसाइड नोट जांच अधिकारी को मृतका के कमरे से मिला था.

निचली अदालत ने सुसाइड नोट के आधार पर दोषी माना था
इसी सुसाइड नोट के आधार पर न‍िचली अदालत ने जगवीर सिंह को आइपीसी की धारा 306 और धारा 498ए के तहत दोषी ठहराया. निचली अदालत के इस आदेश को जगवीर सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि पत्नी को अपने जीवन से अलग करना आत्महत्या के लिए उकसाने वाला कारण नहीं हो सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी एक केस में धारा-306 को परिभाषित किया
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि आइपीसी की धारा-306 के प्रावधान के मुताबिक आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में आरोपी का ऐक्टिव रोल होना चाहिए. या फिर आरोपी की कोई ऐसी हरकत होनी चाहिए जिससे जाहिर हो सके कि उसने आत्महत्या के लिए पीड़ित को सहूलियत प्रदान की है.

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