कुशीनगर । भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थली से 12 किलोमीटर पूरब दक्षिण दिशा में खौवा व बाड़ी नदी के बीच स्थित मैनपुर कोट से लोगों का आस्था व विश्वास जुड़ा है यह एक अध्यात्मिक व पौराणिक स्थल के रूप में सर्वमान्य है,यहां 12 महीने श्रद्धालुओं के आने-जाने का सिलसिला चलता रहता है,स्थानीय लोगों के साथ-साथ बिहार और अन्य प्रांतों के श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र होने के नाते नवरात्रों में यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है,इस सिद्ध स्थल का उल्लेख श्रीलंका के बौद्ध ग्रंथ दीपवंश में भी वर्णित है, यहां पर साधक पहुंचकर साधना करते हैं तथा सबकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
सबकी मनोकामनाएं पूरी करती है माँ मैनपुर
माँ मैनपुर के दरबार मे जो सच्चे मन से आता है,उसकी मनोकामनाएं जरूर पूरी होती है।माँ अपने बच्चो का ख्याल पर उनपर दया दृष्टी बनाई रखती है।माँ के दरबार से कोई खाली नही जाता।
मल्लो की छावनी थी मैनपुर कोट
कुशीनगर का जिक्र बुद्ध धर्मग्रन्थ दिपवंश मे भी मिलता है।वर्णन के मुताबिक कुशीनगर मल्लो की राजधानी थी।मल्लो ने मैनपुर को अपना छावनी बनाया था।इसमे भगवान बुद्ध के निर्वाण स्थली का उल्लेख के साथ ही मैनपुर को छावनी के रुप मे बताया गया है,दीपवंश से बताया गया है कि मैनपुर कोट की देवी मल्लो की उद्धारक थी। कोई युद्ध हो या कोई आपदा में पहले माता का पूजा अर्चन होता था। तत्पश्चात ही युद्धघोष या निदान किया जाता था।
पांडवो ने गुजारा था अज्ञातवास
जनश्रुतियों के अनुसार मैनपुर कोट का सम्बंध महाभारत काल से जुड़ा हुआ है,कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय पांडवो ने यहा पर आकर कुछ समय बिताया था।उस समय यह क्षेत्र देवारण्य के रुप मे विख्यात था।
बंजारों की कुलदेवी हैं
बेतो के घने जंगल से घिरे इस क्षेत्र में आसपास बंजारों की आबादी थी,वह मैनपुर भगवती को अपना कुलदेवी मानते थे।बंजारे यहां पूजा अर्चना करते और माता का आशीष लेते थे। बीसवीं शताब्दी तक यहां बंजारों का निवास था।
साधना का स्थल है मैनपुर
मैनपुर कोट स्थल साधना का प्रमुख केंद्र रहा है,मंदिर के पुजारी मौनी बाबा जी के अनुसार यहा साधको की भरमार थी।साधना करने को शांत व निर्जन स्थल होने से अधिकतर साधक इस क्षेत्र को चुनते थे।
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