हाटा/कुशीनगर।जीवन में योग का महत्वपूर्ण स्थान है बिना इसके किसी भी व्यक्ति को न तो लौकिक सिद्धि मिल सकती है और न ही आध्यात्मिक।इसलिए योग को जीवन में अंगीकृत करना चाहिए।
उक्त बातें द्वारकाधीश संस्कृत अकादमी द्वारका गुजरात के पूर्व निदेशक प्रो जयप्रकाश नारायण द्विवेदी ने श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली एवम् श्रीनाथ संस्कृत महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दस दिवसीय योगप्रशिक्षण एवम् सांख्ययोग सिद्धांत विमर्श वर्चुअल कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कहीं।उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से योग की प्राचीनता का वर्णन किया और कहा कि प्राचीन योग को मै तुम्हें बता रहा हूँ जिसे पहले मैंने सूर्य को दिया था सूर्य ने मनु को ,मनु ने, इक्ष्वाकु को, इक्ष्वाकु ने अन्य ऋषियों को।जीवन मुक्ति की स्थिति में पहुँचने के बावजूद योग के बिना वह पुनः भ्रष्ट हो सकता है और विदेह मुक्ति नहीं मिल सकती है।शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग आवश्यक है।आज प्रधानमंत्री हर रोज योग की साधना करते हैं, भारत आज पुनः विश्व गुरु बन रहा है।योग प्रशिक्षण केन्द्रों को विस्तार देने की जरूरत है। कार्यशाला का शुभारंभ प्राचार्य डा राजेश कुमार चतुर्वेदी, डा बशिष्ठ द्विवेदी के मंगलाचरण से हुआ।इस अवसर पर श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो केदारनाथ परोहा, ने अध्यक्षता किया।इस दौरान स्वागत भाषण एवम् विषय प्रवर्तन प्रो महेश प्रसाद सिरोड़ी, विशिष्ट अतिथि शांता मिश्रा, धन्यवाद डा मोहनलाल शर्मा ने दिया।
कार्यशाला के संरक्षक प्रो हरेराम त्रिपाठी, परामर्शदाता प्रो महेश प्रसाद सिलोड़ी,निर्देशक प्रो मार्कंडेय नाथ तिवारी, उपाध्यक्ष गंगेश्वर पाण्डेय, अग्निवेश मणि, सहसंयोजक डा राजेश कुमार चतुर्वेदी, डा बशिष्ठ द्विवेदी, योग प्रशिक्षक हिमांशु रतूड़ी रहे ।विशिष्ट अतिथि शांता मिश्रा वाशिंगटन डीसी ने योग पर वक्तव्य दिया।सफल संचालन प्रो मार्कंडेय नाथ तिवारी ने किया।
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