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आधुनिकता के दौड़ में अब नही सुनाई देती फाग की गूंज और ढोलक की थाप

अनिल पाण्डेय

Reported By:

Mar 5, 2025  |  6:29 PM

197 लोगों ने इस खबर को पढ़ा.
आधुनिकता के दौड़ में अब नही सुनाई देती फाग की गूंज और ढोलक की थाप
  • विलुप्त हो रही है गाँव के अंदर से होली मनाने की पुरानी परंपराएं
  • फागुन महीने में अब गाँव के अंदर नही दिख रही है फाग के गीतों को गाने वाली टोली

बोदरवार/कुशीनगर। आधुनिकता की दौड़ में होली के पारंपरिक गीतों की मधुर आवाज और ढोलक की थाप धीरे धीरे विलुप्त होती जा रही है I इस नये दौड़ में तमाम लोक परंपराओं सहित संस्कृतियों का जहाँ लोप हुआ है I वहीं पूर्वी भारत का माना जाने वाला सबसे बड़ा त्यौहार होली गाँव के अंदर भी अब सिमटता सा दिख रहा है I आधुनिकता के इस युग में अब कहीं भी गाँव के अंदर नहीं सुनाई देती है फाग के गीत और ढोलक की थाप I होली को मनाने के तौर तरीके भी बदल गए अब तो झाल, मंजीरे और ढोलक पर सुनाई देने वाली फाग के गूंज की जगह गली, नुक्कड़ और चौराहों पर डीजे की गूंज सुनाई देती है I

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ज्ञात हो, कि समय के साथ ही साथ अब लोगों के रहन सहन भी बदलता हुआ दिख रहा है I इसका खास असर त्योहारों पर भी नजर आने लगा है I इस दौड़ में धीरे धीरे होली के प्रमुख गीत और फाग के गीतों का मधुर आवाज विलुप्त होती जा रही है I स्थित यह है कि शहरी क्षेत्र को छोड़ कर देखें तो ग्रामीण इलाकों के गांवों में भी फाग के राग की गूंज बड़ी मुश्किल से ही सुनाई देती है I पहले होली का हुड़दंग एक सप्ताह पूर्व से ही चलता था I गांव से लेकर शहर तक झाल, मंजिरों के साथ ढोलक की थाप पर फाग के राग में धार्मिक गीतों की गूंज सुनाई देती थी I लेकीन अब आधुनिकता की दौड़ में समय के साथ ही साथ होली मनाने का तौर तरीका भी बदल गया I कई दिनों तक चलने वाला होली का हुड़दंग अब कुछ घंटों में ही सिमट कर रह गया I बसंत पंचमी से ही सुनाई देने वाली फाग की राग गांव के अंदर अब तो बमुश्किल ही सुनाई देती है I फागुन महीने में अब गाँव के अंदर नही दिखाई दे रही है फाग के गीतों को गाने वाली टोली I

एकता और भाईचारे का प्रतिक इस त्यौहार में अब पौराणिक प्रथाएँ पूरी तरह से गौण होती हुई दिख रही है I त्योहारों के स्वरूप और मायने भी अब बदलते हुए दिखाई देते हैं I होली का यह त्यौहार बसंत पंचमी के दिन से बसंत उत्सव के रुप में शुरु होकर फागुन मास के पूर्णिमा तक चलता है I चालीस दिनों तक ढोल, मंजीरा के साथ पारंपरिक फाग के गीतों से देर रात तक गाँव की गलियाँ तक गुलजार रहा करती थी I दो दशक पूर्व बसंतोत्सव का धुन ऐसा दिखता था I

कि होली के दौरान क्या बच्चे, क्या बूढ़े अपने अंदर के गिले शिकवे को भूल कर सभी लोग एक रंग में रंगने के लिए आतुर रहते थे I और होली खेले रघुवीरा अवध में…… आदि पारंपरिक होली गीतों के साथ रम जाते थे I परंतु आधुनिकता की ऐसी बयार बही की शहर से लेकर गाँव तक के लोग इसकी आंधी में डगमगा से गए I

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