जहां एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार ने रोज रोज की मिल रही तेज ध्वनि की शिकायतों को संज्ञान में लेते हुए सारे मंदिरों तथा मस्जिदों पर लगे भोंपू तथा साउंड को या तो उतरवा दिया या उनकी आवाज इतनी कम करा दिया गया , जिससे की किसी को कोई परेशानी न हो । एक मनुष्य के कानो के लिए किसी भी आवाज को सुनने की भी एक छमता होता है । अगर उससे ज्यादा आवाज उसके कानो पर पड़े तो वो मनुष्य बहरा भी हो सकता है । बैज्ञानिको द्वारा सामान्य श्रवण सीमा 0 dBHL (डेसिबल हियरिंग लेवल) से है, जो कि ऑडियोमेट्रिक शून्य है, 20 dBHL तक । कोई भी सीमा, किसी भी आवृत्ति पर, जो कि 20 डीबीएचएल से अधिक है, को श्रवण हानि के रूप में पहचाना जाता है। हालांकि जोर के लिए एक ‘सामान्य’ श्रव्य सीमा 0 – 180dB है, 85dB से अधिक कुछ भी हमारी सुनवाई के लिए हानिकारक माना जाता है । बहरहाल इसपर न तो किसी अधिकारी का नजर जाता है न ही उनके कानो को कोई आवाज । यह एक सोचनीय प्रश्न है की क्या कोई भी धार्मिक रैली या धार्मिक अनुष्ठान सिर्फ स्पीकर के साउंड तक ही सीमित रह गया है ? आखिर इतने साउंड बांध कर आवाज करना किसके हित मैं है ? क्या किसी ने सोचा है की कोई मनुष्य हार्ट का मरीज हो सकता है , कोई सीरियस हालत में हॉस्पिटल में पड़ा है या किसी बच्चे के कानो तक यह आवाज क्या करामात ढायेगा ? जवाब है नही । बस लोगो को एक दूसरे की प्रतिक्रिया का इंतजार रहता है । अगर उसने इतना साउंड बांध कर रैली निकला तो हम किसी से कम नही हम उससे भी ज्यादा बांध कर बजाएंगे । पर अब ऐसा लगता है की लोग मानवता धर्म को भूल सा गए है ।
देखना अब यह है की जिस आवाज को लेकर उत्तरप्रदेश सरकार ने मस्जिदों और मंदिरों से भोंपू , स्पीकर को बंद कराकर अपनी वाहवाही लुटा था क्या वह सरकार , प्रशासन इन धार्मिक जुलूसों से स्पीकर , साउंड को कब तक बंद कराकर लोगो को इससे राहत देता है ?
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