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अखाड़े की गूंज से गूंजेगा नैनुपहरु: अंतरराष्ट्रीय पहलवानों संग 16 फरवरी को विराट दंगल का महाकुंभ

Surendra nath Dwivedi

Reported By:

Feb 15, 2026  |  7:14 PM

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अखाड़े की गूंज से गूंजेगा नैनुपहरु: अंतरराष्ट्रीय पहलवानों संग 16 फरवरी को विराट दंगल का महाकुंभ WhatsApp
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तमकुहीराज,कुशीनगर। ग्रामीण खेल संस्कृति की पहचान और पारंपरिक अखाड़ा परंपरा का प्रतीक दंगल न केवल शारीरिक क्षमता के प्रदर्शन का मंच है, बल्कि यह सामाजिक सौहार्द, अनुशासन और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने का सशक्त माध्यम भी है। दंगल युवाओं को मेहनत, संयम और खेल के प्रति समर्पण सिखाता है तथा उन्हें नशा व अन्य सामाजिक बुराइयों से दूर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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उक्त बातें अभिप्रियम ग्रुप के सीएमडी अभिषेक मिश्रा ने एक भेंटवार्ता के दौरान कही। उन्होंने बताया कि इस वर्ष आयोजित होने वाला दंगल विशेष रूप से ऐतिहासिक होगा, क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवानों की सहभागिता सुनिश्चित की गई है। यह पूरे क्षेत्र के लिए गौरव और सौभाग्य की बात है। उन्होंने क्षेत्रवासियों से अपील की कि वे 16 फरवरी को बड़ी संख्या में पहुंचकर इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बनें।

बताते चलें कि ग्राम सभा नैनुपहरु, थाना तमकुहीराज, जनपद कुशीनगर में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 16 फरवरी को विराट दंगल का आयोजन किया जा रहा है। इस भव्य आयोजन का दायित्व अभिप्रियम ग्रुप के सीएमडी अभिषेक मिश्रा द्वारा निभाया जा रहा है। महाशिवरात्रि एवं होली जैसे पर्वों के अवसर पर आयोजित होने वाले दंगल ग्रामीण अंचलों में शक्ति, परंपरा और सामुदायिक एकता के प्रतीक माने जाते हैं।
दंगल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आयोजकों ने बताया कि अखाड़े में होने वाला नियमित अभ्यास पहलवानों को शारीरिक रूप से मजबूत, फुर्तीला और मानसिक रूप से सतर्क बनाता है। यह खेल सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखता है, जहां कुश्ती को पूजा और अखाड़े को मंदिर का दर्जा प्राप्त है। साथ ही, यह अनुशासन, कड़ी मेहनत और जीवन मूल्यों के विकास में सहायक सिद्ध होता है।
दंगल ग्रामीण क्षेत्रों की छुपी हुई प्रतिभाओं को मंच प्रदान करता है, जिससे अनेक पहलवान आगे चलकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाते हैं। यह आयोजन गांवों में आपसी भाईचारे को मजबूत करता है और युवाओं को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है।
कुल मिलाकर, दंगल केवल जीत-हार का खेल नहीं, बल्कि भारतीय ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग है, जो शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सशक्तिकरण का प्रतीक बनकर आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

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