कुशीनगर। जिस एपी तटबंध को बचाने के लिए सोमवार को पूरा दिन प्रशासनिक और सिंचाई विभाग का अमला मौके पर डटा रहा, जहां सीपेज, रैट-होल और कटान को रोकने के लिए लगातार बचाव कार्य चल रहा था, आखिरकार देर रात वही आशंका भयावह हकीकत में बदल गई। सोमवार रात करीब 10:30 बजे जवही दयाल गांव के ततवा टोली के सामने एपी तटबंध का करीब 20 फुट हिस्सा बड़ी गंडक नदी के तेज दबाव में टूट गया। तटबंध टूटते ही नदी का पानी तेजी से आसपास के गांवों की ओर फैलने लगा और देखते ही देखते ग्रामीणों के सामने बाढ़ के संकट ने विकराल रूप ले लिया।
तटबंध टूटने की खबर फैलते ही जवही दयाल समेत आसपास के गांवों में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपने घरों में रखे जरूरी सामान, अनाज, बच्चों और पशुओं को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में जुट गए। गौरहा, सिसवा, बाघाचौर, बाकखास, चैनपट्टी, आवपुर और भगवानपुर समेत कई गांवों के प्रभावित होने की सूचना है। करीब 20 हजार की आबादी पर बाढ़ का असर पड़ने की बात सामने आ रही है।
एपी तटबंध के इस संवेदनशील हिस्से पर सोमवार को दिनभर प्रशासनिक अधिकारियों और सिंचाई विभाग की टीमों की आवाजाही बनी रही। नदी के बढ़ते दबाव के बीच तटबंध में सीपेज और रैट-होल के साथ कटान ने अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी थी। पानी को नियंत्रित करने और कमजोर हिस्सों को बचाने के लिए बोरे, जियोबैग और अन्य सामग्री लगाकर बचाव का प्रयास किया जा रहा था।
ग्रामीण भी प्रशासनिक टीमों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तटबंध को बचाने में जुटे थे। लेकिन नदी का दबाव लगातार बढ़ता गया और देर रात तटबंध ने जवाब दे दिया।
करीब 20 फुट हिस्से के टूटते ही पानी को जैसे गांवों की ओर जाने का खुला रास्ता मिल गया।
तटबंध टूटने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन परिवारों के सामने खड़ी हो गई है, जिनके घर और खेत पानी के रास्ते में हैं। किसानों की महीनों की मेहनत से तैयार फसल पानी में डूबने लगी है। घरों में रखा अनाज, सामान और जरूरी वस्तुओं को बचाने के लिए लोग रात में ही जद्दोजहद करते नजर आए।
किसी परिवार के सामने बच्चों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की चिंता है तो किसी के सामने बुजुर्गों को घर से बाहर निकालने की चुनौती। पशुपालकों के लिए मवेशियों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना अलग संकट बना हुआ है।
ग्रामीणों के लिए यह महज बाढ़ का पानी नहीं, बल्कि उनकी सालभर की मेहनत, जमा-पूंजी और आशियाने को बचाने की लड़ाई बन गई है।
करोड़ों की परियोजना के बीच तटबंध की मजबूती पर फिर सवाल
नरवाजोत-चैनपट्टी तटबंध की सुरक्षा और सुदृढ़ीकरण को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। जुलाई में सामने आई रिपोर्टों में संवेदनशील स्थलों की सुरक्षा के लिए 32.71 करोड़ रुपये की स्वीकृति का उल्लेख किया गया था। उस समय ग्रामीणों की ओर से निर्माण कार्य की गुणवत्ता, काम की गति और मानसून से पहले सुरक्षात्मक कार्य पूरा किए जाने को लेकर चिंता जताई गई थी। सिंचाई विभाग की ओर से तब करीब 80 प्रतिशत कार्य पूरा होने की बात कही गई थी।
अब तटबंध टूटने के बाद वही सवाल एक बार फिर सामने है—जब करोड़ों रुपये की योजनाएं तटबंध की सुरक्षा के लिए थीं, तो नदी के दबाव में कमजोर हिस्सा क्यों टूट गया?
हालांकि इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी पर आरोप लगाकर नहीं दिया जा सकता। तटबंध टूटने के वास्तविक कारणों का पता तकनीकी जांच, निर्माण की गुणवत्ता की जांच और स्वीकृत धनराशि के उपयोग की पड़ताल के बाद ही चल सकेगा।
तटबंध टूटने की सूचना मिलते ही प्रशासन, पुलिस, सिंचाई विभाग और आपदा राहत से जुड़ी टीमें सक्रिय हो गईं। प्रभावित इलाकों में स्थिति पर नजर रखी जा रही है। ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने तथा संवेदनशील इलाकों से लोगों को निकालने का प्रयास शुरू किया गया है।
प्रशासन की प्राथमिकता फिलहाल जान-माल की सुरक्षा, प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना और पानी के फैलाव पर नियंत्रण करना है। मुख्यमंत्री स्तर से भी बाढ़ की स्थिति को लेकर राहत एवं बचाव कार्य में तेजी लाने के निर्देश दिए जाने की सूचना है।
बता दे दिनभर तटबंध को बचाने की कोशिश होती रही और रात में तटबंध टूट गया। अब चुनौती सिर्फ टूटे हिस्से को रोकने की नहीं, बल्कि पानी के बढ़ते फैलाव से गांवों, आबादी, फसल और पशुधन को बचाने की है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते कमजोर हिस्सों को पूरी तरह सुरक्षित कर लिया जाता तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। वहीं विभागीय स्तर पर बचाव कार्य लगातार किए जाने की बात सामने आती रही है। ऐसे में तटबंध टूटने के कारणों और बचाव कार्य की प्रभावशीलता की निष्पक्ष तकनीकी जांच महत्वपूर्ण हो गई है।
नदी का पानी उतर जाएगा, लेकिन सवाल बाकी रहेंगे…!
बाढ़ का पानी आज नहीं तो कल उतर जाएगा। खेत फिर सूखेंगे, रास्ते खुलेंगे और जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य होगी। लेकिन जिन किसानों की फसल बर्बाद हुई है, जिन परिवारों के घरों में पानी घुसा है और जिन लोगों को रात के अंधेरे में अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थान तलाशना पड़ा है, उनके नुकसान की भरपाई इतनी आसानी से नहीं होगी।
चैनपट्टी में एपी तटबंध का टूटना सिर्फ मिट्टी और बालू के बह जाने की घटना नहीं है। यह उस पूरी व्यवस्था की परीक्षा है, जो हर मानसून से पहले तटबंधों की सुरक्षा के दावे करती है।
अब निगाहें दो बातों पर हैं—पहली, प्रशासन इस संकट से प्रभावित लोगों को कितनी जल्दी सुरक्षित करता है और दूसरी, तटबंध टूटने के पीछे वास्तविक कारण क्या निकलकर सामने आता है।
क्योंकि गंडक का पानी एक दिन उतर जाएगा,
लेकिन चैनपट्टी के लोगों के मन में आज की रात से उठे सवाल शायद इतनी जल्दी नहीं उतरेंगे।
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