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भक्तों की मन्नते पूरी करती हैं, मां कुलकुला देवी….शारदीय व चैत नवरात्र में भक्तों लगा रहता हैं तांता

न्यूज अड्डा डेस्क

Reported By:

Oct 15, 2023  |  1:46 PM

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भक्तों की मन्नते पूरी करती हैं, मां कुलकुला देवी….शारदीय व चैत नवरात्र में भक्तों लगा रहता हैं तांता
  • दुर्गा सप्तशती व मार्कण्डेय पुराण में भी माँ कुलकुला देवी का वर्णन हैंl

कसया/कुशीनगर । तहसील क्षेत्र के कुड़वा दिलीप नगर स्टेट के घने जंगलों के बीच में स्थापित माँ कुलकुला देवी का स्थान हैं। मान्यता है कि मां कुलकुला देवी का स्थान हजारो वर्षो पुराना हैं। मंदिर गृह में दो मिट्टी की पिंडी के रूप में मां विद्यमान हैं। कुलकुला देवी का स्थान चारों दिशाओं से नदियों से घिरा हुआ है। ऐसा मान्यता हैं कि जो भी भक्त मां के दरबार में सच्चे मन से मन्नत मांगता है वह जरूर पूरी होती हैं। बताते चले कि यहाँ पर शारदीय व चैत नवरात्र में दर्शन करने के लिये श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है। इस स्थान के बारे में नदवा विशुनपुर निवासी गीता प्रेस के सम्पादक स्व.पंडित रामनारायण दत्त शास्त्री “राम” ने इस स्थान का वर्णन दुर्गा सप्तशती में भी किया हैं। ये स्थान बिना छत वाली मां के नाम से भी प्रसिद्ध हैं । कुलकुला देवी स्थान की महिमा का वर्णन पौराणिक धर्मग्रंथों, शास्त्रों में भी मिलता है। अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने मां कुलकुला देवी की आराधना की थी। मां ने प्रसन्न होकर विजयी भव: का उन्हें आशीर्वाद दिया था।  यह स्थान तंत्र साधकों के लिए खास महत्व रखता है। दूर दराज से अवघड़, साधु संत मन्त्र सिद्धि के लिये इस स्थान पर आते हैं।

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मार्कंडेय पुराण के वर्णन के अनुसार सतयुग में राजा सुरत सूर्य और समाधि वैश्य ने मेघा ऋषि से देवी दुर्गा सत्पसती का श्रवण कर तप किया था। जिससे प्रसन्न होकर देवी ने मनवांछित वर दिया। जिसके फलस्वरूप माता के आशिर्वाद से राजा सुरत सूर्य के वंश में राजा मनु की उत्पत्ति हुई। श्रीराम पुत्र कुश कुल देवी के रूप में मां कुलकुला देवी की आराधना की थी।
कुलकुला स्थान पर देवी के अवतरित होने का श्रेय रहसू गुरु को दिया जाता है। लोगों की धारणा है कि उनके आह्वान पर देवी पश्चिमी बंगाल के कंवरू कमाच्छा स्थान से चली थीं। मान्यता है कि देवी ने यहां मदनपुर जाने के पूर्व क्षण भर विश्राम किया था। नदियों की कलकल ध्वनि के कारण स्थान का नाम कुलकुला देवी पड़ा। देवी पीठ चारों ओर से चारदीवारी से घिरा है। अब तक पीठ पर छत डालने का कोई भी प्रयास सफल नहीं हुआ।

किंवदंती के अनुसार छत बनाने का प्रयास जिन भक्तों ने किया, उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। वर्तमान में इस स्थान का प्रबंधन कुँवर उपेन्द्र सिंह के हाथों में है ।देवी स्थान के चार वर्ग किमी क्षेत्र में फैले घने जंगल को वन विभाग ने संजय वन घोषित कर रखा है। स्थान सैकड़ों की संख्या में विचरते लंगूर और मोरों का बसेरा बना हुआ है। काफी संख्या में मोर हैं, अजगर, सर्प, हिरन और नीलगाय कौतूहल का विषय बने हुए हैं।

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