कुशीनगर। पुलिस अधीक्षक केशव कुमार के एक वर्ष के कार्यकाल में अपराधियों पर कार्रवाई, पुलिसकर्मियों पर विभागीय शिकंजा और शिकायत निस्तारण के आंकड़े चर्चा में रहे। IGRS में 97.17 प्रतिशत शिकायतकर्ताओं की संतुष्टि और लगातार 11वीं बार प्रदेश में पहला स्थान पुलिस की प्रशासनिक कार्यप्रणाली का एक आंकड़ा जरूर प्रस्तुत करता है। लेकिन पुलिसिंग की असली तस्वीर केवल सरकारी आंकड़ों से नहीं बनती। थाने तक पहुंचने वाले आम आदमी का अनुभव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।एक साल पूरा होने के मौके पर जब पुलिसिंग को जनता की नजर से देखने की कोशिश की गई तो तस्वीर एकरंगी नहीं, बल्कि अलग-अलग अनुभवों से बनी दिखाई देती है।
“पहले शिकायत लेकर कई बार जाना पड़ता था, अब सुनवाई जल्दी होती है”
तमकुहीराज क्षेत्र के एक ग्रामीण का कहना है कि पुलिस अधिकारियों की जनसुनवाई और उच्चाधिकारियों तक सीधे शिकायत पहुंचाने की व्यवस्था से फरियादियों को अपनी बात रखने का अवसर मिला है। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर समस्या का समाधान नहीं होने पर पुलिस कार्यालय में शिकायत करने की व्यवस्था उपयोगी साबित होती है।
“कार्रवाई तभी अच्छी लगती है, जब शिकायतकर्ता को न्याय मिले”
पडरौना क्षेत्र के एक व्यापारी ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई का असर तभी महसूस होता है, जब पीड़ित व्यक्ति को समय से सहायता मिले। उनके मुताबिक अपराधियों पर कार्रवाई की खबरें लगातार सामने आती हैं, लेकिन आम आदमी की अपेक्षा यही रहती है कि पुलिस उसकी शिकायत को भी गंभीरता से सुने और कार्रवाई की स्थिति की जानकारी दे।
युवाओं में पुलिस की सख्ती को लेकर अलग नजरिया
कसया क्षेत्र के एक युवा का कहना है कि सड़क पर यातायात नियमों, तेज आवाज वाले डीजे और संदिग्ध गतिविधियों पर पुलिस की सख्ती दिखाई दे रही है। हालांकि उनका मानना है कि कार्रवाई के साथ लोगों को नियमों के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है।
महिलाओं के लिए सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा
तरयासुजान क्षेत्र की एक महिला ने कहा कि महिलाओं की शिकायतों पर पुलिस की त्वरित सुनवाई बेहद जरूरी है। मिशन शक्ति और महिला हेल्प डेस्क जैसी व्यवस्थाओं का फायदा तभी दिखाई देगा, जब पीड़ित महिला बिना झिझक थाने पहुंच सके और उसे सम्मानजनक व्यवहार के साथ मदद मिले।
“अपराधी पर कार्रवाई अच्छी बात, लेकिन निर्दोष परेशान न हो”
हाटा क्षेत्र के एक नागरिक ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर अपनी प्राथमिकता बताते हुए कहा कि अपराधियों के खिलाफ सख्ती जरूरी है, लेकिन हर कार्रवाई में निष्पक्ष जांच और दोनों पक्षों की बात सुनना भी उतना ही जरूरी है। उनके अनुसार पुलिस पर जनता का भरोसा इसी संतुलन से मजबूत होता है।
आंकड़ों और अनुभव के बीच खड़ी है कुशीनगर की पुलिसिंग
IGRS में मिले 97.17 प्रतिशत संतुष्टि के आंकड़े निश्चित रूप से शिकायत निस्तारण की तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि यह आंकड़ा IGRS पर शिकायत दर्ज कराने वाले और फीडबैक देने वाले लोगों का है, पूरे जिले की आबादी का सर्वे नहीं।
इसीलिए SP केशव कुमार के एक वर्ष के कार्यकाल को समझने के लिए सरकारी आंकड़ों के साथ जनता की वास्तविक प्रतिक्रिया को भी सामने रखना जरूरी है।
किसी के लिए पुलिस की त्वरित कार्रवाई राहत बनी, तो किसी के लिए अभी भी थाने की चौखट पर सुनवाई सबसे बड़ी जरूरत है। किसी ने अधिकारियों की जनसुनवाई को उपयोगी बताया तो किसी ने स्थानीय स्तर पर शिकायतों के बेहतर फॉलोअप की अपेक्षा जताई।
जनता का सीधा सवाल—“हमारी शिकायत पर कितनी जल्दी कार्रवाई होगी?”
पुलिसिंग की सफलता का अंतिम पैमाना केवल यह नहीं कि कितने अपराधी पकड़े गए, कितने मुकदमे दर्ज हुए या कितने पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई।
असली कसौटी यह भी है कि रात में संकट में फंसा आम आदमी पुलिस को फोन करे तो कितनी जल्दी मदद पहुंचे, पीड़ित थाने जाए तो उसकी बात कितनी गंभीरता से सुनी जाए और कार्रवाई के बाद उसे न्याय का भरोसा कितना महसूस हो।
SP केशव कुमार के एक वर्ष के कार्यकाल में कार्रवाई और उपलब्धियों के आंकड़े सामने हैं। अब इन आंकड़ों की जमीन पर पड़ने वाली तस्वीर कुशीनगर की जनता के अनुभवों से ही पूरी होगी।
जनता की जुबानी—आपका अनुभव क्या कहता है?
क्या आपके थाने में शिकायत सुनी गई?
क्या पुलिस ने समय पर कार्रवाई की?
क्या पुलिस का व्यवहार बदला हुआ महसूस हुआ?
क्या अपराधियों में पुलिस का डर बढ़ा?
क्या आम आदमी का भरोसा पुलिस पर मजबूत हुआ?
कुशीनगर की पुलिसिंग पर सबसे सटीक रिपोर्ट कार्ड सरकारी आंकड़ों और जनता की आवाज—दोनों को साथ रखकर ही तैयार होगा।
🔴 चार कड़ियों की सीरीज का अंतिम बॉक्स
SP केशव कुमार : एक साल की चार तस्वीरेंसीरियल-1 : अपराधियों पर कार्रवाई और बड़े ऑपरेशन
सीरियल-2 : खाकी पर शिकंजा—पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई
सीरियल-3 : आंकड़ों में पुलिसिंग—97.17% संतुष्टि और 11वीं बार प्रदेश में प्रथम
सीरियल-4 : जनता की नजर से पुलिसिंग—आम आदमी क्या कहता है?
चार खबरें, चार पहलू और एक साल की पूरी तस्वीर।
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