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श्रीकृष्ण जन्मोत्सव में भजनों की धुन पर झूमे श्रद्धालु

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय

Reported By:

Feb 16, 2025  |  3:48 PM

131 लोगों ने इस खबर को पढ़ा.
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव में भजनों की धुन पर झूमे श्रद्धालु

अहिरौली बाजार/कुशीनगर कप्तानगंज विकास खण्ड क्षेत्र अंतर्गत पकड़ी में आयोजित भागवत कथा के पांचवे दिनम अयोध्या धाम के सुप्रसिद्ध कथावाचक राधेश्याम शास्त्री महाराज ने गोवर्धन पूजन,रासलीला, कंसबध,श्री कृष्ण रूक्मिणी विवाह की मार्मिक कथा सुनाते हुए कहा कि युद्ध के प्रसंग हों या मिलन के।सारे प्रसंग रास लीला के ही हैं, सारा जीवन ही रास है। सारा जीवन विरोधी शक्तियों पर टीका है ।जीवन का सारा सुख विरोधी के मिलन में छिपा है। जीवन का सारा आनंद और रहस्य विरोधी के मिलन में छिपा है। रास का जो “मेटाफिजिकल’, जो जागतिक अर्थ है, वह समझ लेना उचित है; फिर कृष्ण के जीवन में उसकी अनुछाया है, वह समझनी चाहिए।

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चारों तरफ आंखें उठाएं तो रास के अतिरिक्त और क्या हो रहा है? आकाश में दौड़ते हुए बादल हों, सागर की तरफ दौड़ती हुई सरिताएं हों, बीज फूलों की यात्रा कर रहे हों, या भंवरे गीत गाते हों, या पक्षी चहचहाते हों, या मनुष्य प्रेम करता हो, या ऋण और धन विद्युत आपस में आकर्षित होती हों, या स्त्री और पुरुष की निरंतर लीला और प्रेम की कथा चलती हो, इस पूरे फैले हुए विराट को अगर हम देखें तो रास के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हो रहा है।

रास बहुत “कॉस्मिक’ अर्थ रखता है। इसके बड़े विराट जागतिक अर्थ हैं। पहला तो यही कि इस जगत के विनियोग में, इसके निर्माण में, इसके सृजन में जो मूल आधार है, वह विरोधी शक्तियों के मिलन का आधार है। एक मकान हम बनाते हैं, एक द्वार हम बनाते हैं, तो द्वार में उल्टी ईंटें लगाकर “आर्च’ बन जाता है। एक-दूसरे के खिलाफ ईंटें लगा देते हैं। एक-दूसरे के खिलाफ लगी ईंटें पूरे भवन को सम्हाल लेती हैं। हम चाहें तो एक-सी ईंटें लगा सकते हैं। तब द्वार नहीं बनेगा, और भवन तो उठेगा नहीं। शक्ति जब दो हिस्सों में विभाजित हो जाती है, तो खेल शुरू हो जाता है। शक्ति का दो हिस्सों में विभाजित हो जाना ही जीवन की समस्त पर्तों पर, समस्त पहलुओं पर खेल की शुरुआत है। शक्ति एक हो जाती है, खेल बंद हो जाता है। शक्ति एक हो जाती है तो प्रलय हो जाती है। शक्ति दो में बंट जाती है तो सृजन हो जाता है।

रास का जो अर्थ है, वह सृष्टि की जो धारा है, उस धारा का ही गहरे-से-गहरा सूचक है। जीवन दो विरोधियों के बीच खेल है। ये विरोधी लड़ भी सकते हैं, तब युद्ध हो जाता है। ये दो विरोधी मिल भी सकते हैं, तब प्रेम हो जाता है। लेकिन लड़ना हो कि मिलना हो, दो की अनिवार्यता है। सृजन दो के बिना मुश्किल है।

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