जौरा बाजार/कुशीनगर। यह त्योहार हिंदू महिलाएं अपने पति के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए रखती हैं। ज्येष्ट मास की अमावश्या के दिन विवाहित महिलाएं वट’ (बरगद) के पेड़ की पूजा करती हैं। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है और सनातन धर्म में इसे बहुत शुभ वृक्ष माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि त्रिमूर्ति (भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव) बरगद के पेड़ में निवास करते हैं।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, वट वृक्ष सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाला पेड़ माना जाता है और इसकी अमरता के कारण वट वृक्ष को अक्षय वट के नाम से भी जाना जाता है।पौराणिक कथा के अनुसार सावित्री राजा अश्वपति की बेटी थी, जिसका विवाह सत्यवान से हुआ था, जिसे विवाह के एक साल बाद मरने का श्राप मिला था। शादी के एक साल बाद सत्यवान कमजोर महसूस करने लगा और अपनी पत्नी की गोद में ही चल बसा। सावित्री अपने पति की मृत्यु को स्वीकार नहीं करती है और इस दुर्भाग्य के बारे में यमराज से विद्रोह करती है। उसने यमराज से विनती की कि वह उसके पति को हरगिज न ले जाए। यमराज सावित्री के समर्पण से प्रभावित हुए और उन्हें तीन वरदान दिए, लेकिन एक शर्त रखी कि वह सत्यवान के प्राण नहीं मांगेंगे। तब, सावित्री ने अपने और सत्यवान के 100 बच्चों के लिए कहा। यमराज एक बार फिर सावित्री से प्रभावित हुए और उन्हें बिना किसी शर्त के एक और वरदान दिया। अंत में सावित्री ने अपने पति के प्राण मांग लिए। इसी कारण सुहागिन महिलाएं भी अपने पति के दीर्घायु होने तथा स्वस्थ रहने की कामना से अमावश्या के दो दिन पहले से ही ब्रत रहकर बरगद के पेड़ की पूजा कर आशिर्बाद प्राप्त कर के अन्न जल ग्रहण करती है।
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