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मैं भक्तन का दास,भगत मेरो मुकुट मणि

Ved Prakash Mishra

Reported By:

Dec 23, 2024  |  7:55 PM

145 लोगों ने इस खबर को पढ़ा.
मैं भक्तन का दास,भगत मेरो मुकुट मणि

मथौली बाजार/कुशीनगर । नगर पंचायत मथौली के के वार्ड नंबर 15 स्वामी विवेकानंद नगर (झमईटोला)में यजमान विमला देवी एवं गंगा पाठक के यहाँ चल रहे अमृतमयी भागवत कथा के तृतीय दिवस दिन सोमवार को कथा व्यास भागवत आचार्य सच्चिदानंद जी ने श्रीकृष्ण का विदुर के घर आगमन कथा का विस्तार से वर्णन किया।

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श्रीमद भागवत कथा के तृतीय दिवस पर कथा में व्याख्यान करते हुए कथा व्यास श्री सच्चिदानंद जी ने बताया कि सबसे ऊंची, प्रेम सगाई है। भगवान श्री कृष्ण दुर्योधन को निमंत्रण देने पर जब उसके महल की तरफ जा रहे थे। तभी दुर्योधन के मन में विचार आया कि भगवान मेरे घर तब आए, जब कोई न देखे। दुर्योधन के मन में अहंकार था कि मैं इतना बड़ा राजा उसकी अगवानी करूंगा तो प्रजा के सामने मेरा मान कम हो जाएगा। भगवान श्री कृष्ण दुर्योधन के इस मनोभाव को जानकर अपने रथ के घोड़ों का मुंह विदुर के घर की तरफ कर दिये। भगवान श्री कृष्ण जब विदुर के घर पहुंचे, तब विदुरानी स्नान कर रही थी।
उन्होंने भगवान के आने की आहट सुनी तो वह प्रभु प्रेम में अपने तन की शुद्ध-बुद्ध को भूल कर नग्न ही भगवान को मिलने दौड़ पड़ी। इस दशा में देखते हुए भगवान श्री कृष्ण ने अपना पीतांबर विदुरानी के शरीर पर ढक दिया। इसके बाद विदुरानी भगवान श्री कृष्ण को केले छीलकर छिलके खिलाने लगी। इसी समय विदुर पहुंचे और उन्होंने देखा कि विदुरानी भगवान को छिलके खिला रही है। गुदा फेंक रही है।

उन्होंने भगवान को केले का गूदा खिलाना चाहा। भगवान ने मना कर दिया और कहा जो आनंद छिलके में था। वह इस गूदे में नहीं है। विदुर जी तो अपने पूरे होश में थे। जो प्रेम विदु रानी के हृदय में था। वह विदुर जी के नहीं था। प्रभु के प्रेम में विदुरानी अपने तन की सुधि भूल चुकी थी। प्रभु के प्रेम में समर्पित होकर उनकी सेवा करने लगी। दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाया। भगवान के विदुर के घर जाने से आहत दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि मेरे 36 प्रकार के भोजन को छोड़कर आप दासी के पुत्र के घर भोजन करने चले गये। यह कहां कि बुद्धिमता है। आप तो ग्वाले के ग्वाले ही रह गए। वैसे ही आपकी बुद्धि है।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजा कोई किसी के यहां भोजन करने जाता है। उसके सिर्फ दो ही कारण होते हैं। एक तो प्रेम और दूसरी आपदा। इसमें हमारे पर भोजन की कोई आपदा नहीं है।

जिससे मैं आपका भोजन मांगकर खाऊं और दूसरे तुम्हारे दिल में प्रीत नहीं है। जिससे मैं भोजन करूं। तुमरे प्रीति न, हमरे आपदा, यही बड़ी अनरीति। मेरे लिए तो जो भगत है। वह गरीब हो या अमीर। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं भक्तन का दास, भगत मेरे मुकट मणि।
इस अवसर पर पं.अभिषेक पाठक, दयानंद पाठक, महेन्द्र पाठक, सदानंद पाठक,आलोक पाठक व अस्विनी पाठक सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

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